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Monday, August 18, 2014

काश
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लगता है साम ढलने लगी है,
अंदर एक गहन अंधेरा पसरने लगा है,
फिर टूटे हुए ख्वाबों को संजोने की कोशिश करूंगा,
और सुबह तक फिर ये ख्वाब बिखर जायेंगे,
ख़ौफ होने लगी है उजालों से,
सूर्य की किरनें, आँखों में चुभने लगी है,
कदम उठाने से पहले ही ठिठक जाता हूँ,
निराशा का आलम यह है की,
सिर्फ "काश" बन कर रह जाती है,
दिल की हर तमन्नाएं,
एक बहुत जानी-पहचानी सी आवाज़,
पीछे से पुकारती है मुझे,
और कहती है,
बहुत जा चुके हो दूर,
अब वापस आ जाओ,
मगर मैं, उस अवाज़ को अनसुना कर,
नए ख़्वाब बुनने में लग जाता हूँ.....................मनोरंजन

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