यकीन
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मुझसे शिकायत,
सिर्फ तुम्हे ही नहीं है,
मेरी जिंदगी से जुड़ा हर शय,
मुझसे शिकायत करता है,
कसूर किसी का नहीं है शायद,
ये वक्त का तकाज़ा है,
मैं रफ़्ता-रफ़्ता बनता गया,
गुनाह गार सभी का,
जिनकी खुशियों की वजह कभी,
मैं ही हुआ करता था,
उनके आँसूओं की वजह भी,
मैं ही बना।
कोई तो है जिसने,
निचोड़ लिया मेरे मन की खुशी,
जिसके आने पर सांसों में,
भर जाती थी जिंदगी,
और जाते हुए ऐसे लगता था,
जैसे प्राण खिंचे लिये जा रहा है कोई,
ऐसा नहीं की मैने कभी बताया नहीं उसे,
उसने सुना भी गौर से पर,
उसे यकीन ना हुआ,
एक शख़्स जिसे यकीन हो जाता है,
अक्सर लोगों के झूठ पर भी,
उसे मेरे सच पर यकीन ना हुआ,
तो कसूर किसका है?....................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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