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Saturday, August 2, 2014

रात
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रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कहीं पर फूल खिलते है,
कहीं पर जलती है आग,
कहीं, एक खुश्बू का झोका,
कुरेद जाता है पुराना याद,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कोई ख्वाब देख रहा होता है,
किसी के सामने होता है चांद,
किसी के देखे हुए ख्वाब का,
जल रहा होता है अरमान,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कहीं एक सरसराहट,
सोख लेती है जिस्म से जान,
कहीं चूडियों की खनखनाहट,
से टूटता है ध्यान,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कहीं किसी की महफिलें,
बढ़ती है शराफत की शान,
कहीं किसी की रातें,
कटती है, देख कर आसमान,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।................मनोरंजन

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