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Wednesday, August 6, 2014

सुनहरा बचपन
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कहाँ से लाकर  दूँ अपनी लाडो को,
खूबसूरत, सुनहरा तुम्हारा बचपन,
कंक्रिटो के इस जंगल में,
आँगन कहाँ से लाउं,
इस दो कमरों की दिवारों में,
कहाँ दूँ तुम्हे अजादी की,
दौड सको चौपाया बन कर।
जब भी दौडती हो,
टकरा जाती हो,
बेफजुल से पड़े,
दुनिया भर के ठून्से पड़े समानों से,
कहाँ से लाकर दूँ,
दादी माँ का वो दुलार,
चुटकियों की वो अवाज और टीटकारी,
बाबा के दाढ़ी के बालों को,
छुने का मन तो तुम्हे भी करता होगा,
कंधे पर बैठ कर चौपाल पर,
जाने को तुम्हारा भी मन करता होगा,
कहाँ से लाउं वो चौपाल,
दुकानों से भरे इस शहर में।
कहाँ घुमाने लेकर जाऊ,
कहाँ दिखाऊ मेला तुमको,
किसके साथ खेलोगी बेटा,
आँख मिचौली, टिकम-टेका,
बच्चे सब तो कैद पड़े है,
शराफत के दिवारों में,
विज्ञापन की होड लगी है,
दिल से लेकर दिमाग तक को,
सुन्दर और तेजस्वी बनाने की,
दवा बिक राही है बजरों में,
तुम भी सिख जाओगी जीना,
सीमटी हुई दिवारों में, 
सीमट गया है जहाँ तुम्हारे लिए,
सीमट गया है,
तुम्हारा बचपन।
कहाँ से लाकर दूँ लाडो को,
खूबसूरत, सुनहरा तुम्हारा बचपन।...................................मनोरंजन
 http://manoranjan234.blogspot.in/

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