अधुरा सच
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उसे इस बात की तकलीफ थी की,
मैं, उससे अपना दिया हुआ माँग रहा था,
दोस्ती में ये जायज नहीं था,
बाकी दोस्ती के खातीर,
वो अपना जान भी देने का दम भरता था,
उसे पता था, मुझे नहीं पड़ेगी उसकी जान की जरूरत,
कुछ और मंगता तो उसे लगता था,
मैं अपना दिया हुआ वसूल करना चाह रहा हूँ,
सच को देखना, सुनना, समझना ही नहीं चाहता था,
मेरा सच और मेरी दोस्ती,
दोनों दो विपरित धाराओं में बह रहे थे,
जीतना प्यार मुझे अपनी दोस्ती से थी,
मुझे अपना सच भी उतना ही प्यारा था,
पर दुर्भाग्य मेरा, किसी एक को ही चुनना था,
बहना था किसी एक के साथ ही मुझे,
मैने सच को चुना,
और तडपता रहा हूँ दोस्त के लिए हर पल।.....................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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