शहद के टब
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बाबा अक्सर कहते है,
गरीब आदमी जीवन भर,
दाल-रोटी के लिये,
संघर्ष करते रह जाता है,
और जीवन में कुछ खास करने को,
फुर्सत ही नहीं मिल पाती,
बाबा ने, मुझे इस दाल- रोटी के चक्कर से,
बचाने के लिये ही शहर भेजा था,
बाबा का सोचना कितना सही है,
कहना मुश्किल है,
मगर सच तो ये है की,
मैं कभी भी दाल-रोटी, नमक, तेल और हल्दी,
के चक्कर से मुक्त नहीं हो पाया,
मैं हर वक्त इससे बाहर निकलने के के लिये,
शहद के टब में गिरी मक्खी की तरह,
तडपते रहा,
मैं अपने कोशिशों में शायद,
अपने पंख गंवा कर भी सफल ना हो पाया,
आज भी मैं तडप रहा हूँ,
इस शहद के टब से बाहर निकलने के लिये,
इसके बवजूद की,
मैंने खुद अपनी मार्जी से,
अपनी खुशी से इसमें डुबकी लगाया था।.........................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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