हमारा समाज- एक 'ब्लैक होल'
====================
अच्छा ही हुआ,
जो तुम्हे इस तरह टांग दिया गया,
ये समाज तुम्हे इससे बेहतर कुछ दे भी नहीं सकता,
रोज हजार मौत मरने से तो बेहतर ही है ये,
बस अफसोस इस बात की है की,
खिलाने की ज़ीद पर अड़ि तुम,
खिल ना सकी इस दमघोटों माहौल में,
तुम्हारी सांसों को जब्त कर दिया,
किसी खूनी पंजे ने, किसी दरिंदे ने,
तुम्हारे सपने, तुम्हारी हँसी, तुम्हारे सारे उमंग,
सब अधूरे रह गये,
तुम्हारी चंचलता, तुम्हारी अल्हड़ता,
एक पल में निगल गया कोई,
तुम्हारा ये किस्सा, दफन हो जायेगा,
शीघ्र ही, हमारे समाज के 'ब्लैक होल' में
सब भूल कर तुम्हे लग जायेंगे,
नया कुछ सृजन करने में,
पर मैं सोच रहा हूँ,
कहाँ अपनी जीत का जश्न माना रहा होगा,
वो पुरुषार्थी, जिसने इतने पुरुषार्थ भरे कारनामे किये,
क्या देखता होगा कभी अपना चेहरा आईने में,
आईने में उसके चेहरे पर पड़ी,
तुम्हारी सिसकीओं की दाग,
क्या देखेगी नहीं उसे?
क्या कभी नहाता होगा वो?
नहाते वक्त उसके अंगों में लगी कोढ़,
क्या देखेगी नहीं कभी?
नहीं, ऐसे लोगों के पास आना नहीं होते,
और ये नहाते भी नहीं,
बस अपनी बदबू, और कोढ़ समाज में फैलाते है...........मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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हमारा समाज- एक 'ब्लैक होल'
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अच्छा ही हुआ,
जो तुम्हे इस तरह टांग दिया गया,
ये समाज तुम्हे इससे बेहतर कुछ दे भी नहीं सकता,
रोज हजार मौत मरने से तो बेहतर ही है ये,
बस अफसोस इस बात की है की,
खिलाने की ज़ीद पर अड़ि तुम,
खिल ना सकी इस दमघोटों माहौल में,
तुम्हारी सांसों को जब्त कर दिया,
किसी खूनी पंजे ने, किसी दरिंदे ने,
तुम्हारे सपने, तुम्हारी हँसी, तुम्हारे सारे उमंग,
सब अधूरे रह गये,
तुम्हारी चंचलता, तुम्हारी अल्हड़ता,
एक पल में निगल गया कोई,
तुम्हारा ये किस्सा, दफन हो जायेगा,
शीघ्र ही, हमारे समाज के 'ब्लैक होल' में
सब भूल कर तुम्हे लग जायेंगे,
नया कुछ सृजन करने में,
पर मैं सोच रहा हूँ,
कहाँ अपनी जीत का जश्न माना रहा होगा,
वो पुरुषार्थी, जिसने इतने पुरुषार्थ भरे कारनामे किये,
क्या देखता होगा कभी अपना चेहरा आईने में,
आईने में उसके चेहरे पर पड़ी,
तुम्हारी सिसकीओं की दाग,
क्या देखेगी नहीं उसे?
क्या कभी नहाता होगा वो?
नहाते वक्त उसके अंगों में लगी कोढ़,
क्या देखेगी नहीं कभी?
नहीं, ऐसे लोगों के पास आना नहीं होते,
और ये नहाते भी नहीं,
बस अपनी बदबू, और कोढ़ समाज में फैलाते है...........मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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अच्छा ही हुआ,
जो तुम्हे इस तरह टांग दिया गया,
ये समाज तुम्हे इससे बेहतर कुछ दे भी नहीं सकता,
रोज हजार मौत मरने से तो बेहतर ही है ये,
बस अफसोस इस बात की है की,
खिलाने की ज़ीद पर अड़ि तुम,
खिल ना सकी इस दमघोटों माहौल में,
तुम्हारी सांसों को जब्त कर दिया,
किसी खूनी पंजे ने, किसी दरिंदे ने,
तुम्हारे सपने, तुम्हारी हँसी, तुम्हारे सारे उमंग,
सब अधूरे रह गये,
तुम्हारी चंचलता, तुम्हारी अल्हड़ता,
एक पल में निगल गया कोई,
तुम्हारा ये किस्सा, दफन हो जायेगा,
शीघ्र ही, हमारे समाज के 'ब्लैक होल' में
सब भूल कर तुम्हे लग जायेंगे,
नया कुछ सृजन करने में,
पर मैं सोच रहा हूँ,
कहाँ अपनी जीत का जश्न माना रहा होगा,
वो पुरुषार्थी, जिसने इतने पुरुषार्थ भरे कारनामे किये,
क्या देखता होगा कभी अपना चेहरा आईने में,
आईने में उसके चेहरे पर पड़ी,
तुम्हारी सिसकीओं की दाग,
क्या देखेगी नहीं उसे?
क्या कभी नहाता होगा वो?
नहाते वक्त उसके अंगों में लगी कोढ़,
क्या देखेगी नहीं कभी?
नहीं, ऐसे लोगों के पास आना नहीं होते,
और ये नहाते भी नहीं,
बस अपनी बदबू, और कोढ़ समाज में फैलाते है...........मनोरंजन
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