स्मृति शेष-10
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वादा था तुमसे मिलने का,
मगर बिना जूते और अच्छे कपड़े के,
तुम्हारे हास्टल जाकर,
तुम्हारी सहेलियों के सामने,
तुम्हे शर्मिंदा नहीं कर कर सकता था,
इसलिये,
पता होते हुए भी,
ढूंढते रहा तुम्हे महीनों,
उस नए जगह पर,
जहाँ हम दोनों कुछ बनाने गये थे,
और बन भी रहे थे,
मेरे अंदर एक पुरुष बन रहा था,
और तुम्हारे अंदर एक स्त्री,
महीनों तक, मैं रोज उस जगह जाता,
जहाँ से निकलने की संभावना थी तुम्हारी,
और एक दिन पूर्ण हुए मेरी मनोकामना,
जब डोर से, हमेशा की तरह खिलखिलाते हुए,
तुम चली आ रही थी, अपने दो सहेलियों के साथ,
मुझ पर नज़र पड़ी तुम्हारी,
और तुमने कुछ कहा था अपने सहेलियों के कानों में,
दोनों चुप-छाप चली गयी थी,
कैसा लगा था तुम्हे?
मुझे वहाँ देख कर, शायद पूछा था मैने,
और शायद, तुमने कुछ कहा भी होगा,
पर जिस तरह, हम दोनों बिना एक-दूसरे को सुने,
लगातार बोले जा रहे थे,
उसमें, तुमने क्या कहा, मैने क्या कहा,
कुछ याद ना रहा,
और हम सीधे जाकर गंगा तट पर रुके,
दूर तक फैला गंगा का पानी,
और सूर्य का, बिल्कुल लाल गोला,
गंगा नदी को दूसरे चोर पर छू रहा था,
और इस चोर पर हमदोनों, छो रहे थे गंगा को,
बहुत ही मनोरम लगा था उस दिन गंगा तट,
फिर कभी, कहीं भी,
नहीं दिखी गंगा अपने इतने खूबसूरती के साथ,
हम बातें कर रहे थे,
अपने पाँव को पानी में डुबाए,
शायद मैं "साइंस" की बात कर रहा था,
और तुम "कमर्स" की,
दोनों का कोई मेल नहीं था,
आज जीवन के इस मोड पर आकर देखो,
ना मेरा "साइंस" बचा है,
ना तुम्हारा "क्मर्स" बचा है,
बचा है तो बस जीवन की उबड़-खाबड़ राहें,
मेरे आगे भी,
और तुम्हारे आगे भी।.......................मनोरंजन
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