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Thursday, July 31, 2014

कीमत एहसासों की
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वो जानते है की,
उनसे बात कर मुझे खुशी मिलती है,
तभी तो उन्होने, मुझसे बात करने की,
इतनी बड़ी कीमत माँग ली है।
अब कीमत गर दे पाया तो ठीक है,
वरना जिंदगी,
यों ही निराशा और उदासी के अंधेरे में ही कटेगी।
उन्हे कहाँ परवाह है,
मेरी उदासियों का,
मेरी अनुभूतियों का,
उन्हे तो बस अपनी कीमत पता है,
जो उन्हे उनकी हँसी का मोल चुकायेगा,
सिर्फ उसके लिये ही होगी,
उनकी हँसी,
अफसोस इस बात का रहेगा की,
मैने खुद अपनी कीमत ना आँकी कभी,
यों ही बेमोल बिकता रहा,
इस दुनिया के बज़ार में।.......................मनोरंजन
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Wednesday, July 30, 2014

यथार्थ
=====
मन विचलित है,
वर्तमान का यथार्थ देख कर,
अन्याय और अत्याचार का,
इतना मज़बूत परामार्थ देख कर,
शिकार हो रहे है,
हम जैसे ना जाने कितने,
कुचली जा रही इंसानियत जिसके नीचे,
उस अमानुष का स्वार्थ देख कर,
और बदलाव को उठते कदम असमर्थ देख कर।............मनोरंजन
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Tuesday, July 29, 2014

एक छोटी सी बात-5
==============
ये सच है की,
हृदय तल की गहराइयों से,
प्रेम में बहे आँसू,
आपके अंदर एक बदलाव लाता  है,
असीम दर्द, संघर्षों के बाद मिली असफलता,
के परिणाम स्वरूप दुख में बहे आँसू,
आपको एक मज़बूत और
बेहतर शख्स बना देती है,
पर फिर भी दुनिया ने कभी,
आँसुओं की कद्र नहीं की,
मुस्कुराहटों का राज हमेशा से बना रहा है।..................मनोरंजन
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Monday, July 28, 2014

निश्छल प्रेम
========
किसी के खूबसूरत होने,
ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता,
कोई अपना है, या पराया,
इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता,
उम्र,जाति, दौलत, हैसियत,
जैसे सामाजिक दायरे भी बौने हो जाते है,
दिल की अपनी एक दुनिया है,
जहाँ मिट जाते है सारे फासले,
और रह जाता है,
सिर्फ निश्छलता, अटूट अनुराग,
आशक्ति और समर्पण,
मन बिना किसी शर्त के,निस्वार्थ भाव से,
बन जाता है किसी का दास,
विचारधारा, विद्वता और सोच,
धरे के धरे रह जाते है,
ये जानते हुए भी की मिटते रहे है,
परवाने जल कर,
मिट जाना चाहता है दिल उसकी चाहत में,
जिसे अपने अंदर गहराइयों में बैठा लिया है,
फिर पाने की हसरत नहीं रहती,
बल्कि देने में ही इतना आनंद आता है,
की कुछ पाने की लालसा ही खत्म हो जाती है,
मन बस उड़ते रहना चाहता है,
उन्मुक्त पंक्षी की तरह खुले आसमान में,
मन झूमते रहता है एक खामोश संगीत की धून पर,
डुबा रहता है हर पल अपने प्रियतम की याद में,
हर तरफ जैसे खूबसूरत फूलों के बाग़ उग आये हो,
और दौड़ता है मन उस बाग़ में अपने बाहों को फैलाये,
छुप जाना चाहता है,
अपने प्रियतम के होठों के जुम्बिस में,
और सिर्फ इतनी सी जुस्तज़ू,
की अपना सर रख कर अपने प्रियतम के गोद में,
जी लें सदियों को बस कुछ लम्हों में।........................................मनोरंजन
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Sunday, July 27, 2014

दिल पर ले यार
===========
दिल पर ले यार,
क्योंकि जब तक दिल पर ना लेगा,
जिंदगी घिसटती रहेगी यों ही उम्र भर,
काहिलों की तरह,
मरते रहेंगे दिल से जुड़े हर एहसास,
और फिर बेगैरतों सी गुजरने लगेगी जिंदगी,
बह जाने दे आँसुओं के साथ,
हर दर्द, अपमान और निराशा को,
और बाहर आने दे दिल का हर उबाल,
छुपा मत इसे,
दफन मत होने दे,
इसे दिल के अंदर,
बड़ी संघर्षों से उठती है,
दिल में उबाल,
दहकने दे इसे,दिल के अंदर,
मत डाल इस पर बहनों का पानी,
मत रोक इसे ,पनपने दे आक्रोश को,
बहकने दे अपने जोश को,
दमकने दे इसे अपने चेहरे पर,
अपने व्यक्तित्व में झलकने दे,
दे खुली छूट, इस प्रवाह को,
तोड़ने दे हर बंधन को,
मत घुटने दे इसको,
जिंदा रहने दे इसे दिल में,
इसे मत मर,
दिल पर ले यार।..........................मनोरंजन
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एक छोटी सी बात-3
===========
जीवन की सबसे बड़ी खुशी,
इस एहसास से है की,
कोई हमें चाहता है,
किसी के लिये बहुत महत्वपूर्ण हूँ मैं,
किसी की जरूरत हूँ, और 
किसी की पूरी दुनिया ही मुझ तक है,
.......................
और किसी बहुत करीब रहे शख्स के,
नजरों में महत्वहीन हो जाना,
जीवन की सबसे बड़ी त्रासद,
पीड़ादायक एहसास है।
हम पूरे उम्र,
इसी प्रयास में लगे रहते है की,
हम किसी की जरूरत बने रहें,
किसी की खुशियों की वजह बनें रहें,
कोई हमें, अपने पूरे वजूद से चाहे,
और इसी एहसास के लिये,
हम जीवन भर जी तोड़ मेहनत करते है,
सब कुछ इसी एहसास को बनाये रखने के लिये करते है,
...................
अगर किसी शख्स के दिल में,
किसी ना किसी शख्स की,
चाहत बनने की तमन्ना खत्म हो जाये,
तो उसका जीवन निर्जीव सा हो जाता है।

Friday, July 25, 2014

शुक्रिया परी
========
शुक्रिया परी,
मुझे प्यार सिखने के लिये,
जीवन को समझने,
और जीने लायक बनाने के लिये,
पड़ते है तुम्हारे नन्हे पैर जहाँ,
उस हर जगह को ध्यान से देखता हूँ,
तुम्हे कोई आँच ना आ जाये,
तुम्हारे पैरों तले कोई काँच ना आ जाये,
शुक्रिया परी,
मुझे फिक्र करना,
और परवाह करना सिखने के लिये,
अब समझने लगा हूँ,
माँ के आँसुओं की भाषा,
अब समझने लगा हूँ,
पापा के चिड़चिड़ाहट के हद तक,
परेशान होने का मतलब,
सिखने लगा हूँ जीना किसी और के लिये,
शुक्रिया परी,
मुझे जीवन को समझाने के लिये।.............................मनोरंजन
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एक छोटी सी बात
-------------------
जिस्म की भूख,
आपको सिर्फ नर्क तक लेकर जाती है,
पर पेट की भूख,
आपको कहीं भी लेकर जा सकती है,
शायद नर्क से भी बदतर जगह
...........................................
................................................मनोरंजन
एक छोटी सी बात-2
==============
किसी अच्छे इंसान में भी,
अगर हर वक्त कुछ बुराई ढूंढी जाये,
तो कुछ-ना-कुछ बुराई नजर आ ही जाती है,
और अगर किसी बुरे इंसान में भी,
अगर अच्छाई ढूंढी जाये तो,
ऐसी बहुत सी अच्छी बातें नजर आ जाती है,
जिसे पसंद और प्यार किया जा सके।
जब आप किसी को प्यार करते है तो,
उस व्यक्ति के बारें में हर बात आपको पता चल जाती है,
चाहे वो बताये या ना बताये,
पर जब आप किसी से नफरत करते है, नापसन्द करते है तो,
आपको उसके बारें में पता चली हर बात के,
गलत होने की गुंजाइस ज्यादा रहती है।................मनोरंजन

एक गीत-4
=========
अंतर की श्रद्धा, भक्ति,
ममता, दिल का प्रेम भाव,
ये सारे एक होते नहीं,
सब अलग-अलग है राग,
लेकिन इनसे भी जग सकती है अनुराग,
नदियों का सागर में जाकर हो जाता है मिलाप।
दया, करुणा, सहानुभूति,
संवेदना, स्नेह भाव,
ये सारे एक होते नहीं,
सब अलग-अलग है राग,
लेकिन इनसे भी जग सकती है अनुराग,
नदियों का सागर में जाकर हो जाता है मिलाप।.........................मनोरंजन

एक ख्वाब के मरने की पीडा
====================
कुछ है जो मेरे दिल में उबलते रहती है,
कहीं, किसी की कमी हर पल अखरते रहती है,
एक अजनबी प्यास से तडपता रहा हूँ हर पल,
एक अनजानी तलाश में रात भर टकटकी लगाये रहता हूँ,
किसी ऐसे शख्स से मिलने की तमन्ना दिल में मचलती रहती है,
जिसके खामोश इशारे की भाषा समझ सकूँ,
सुबह के बेरहम- बदनसीब निंद,
जिसके कोमल स्वर की पुकार सुन,
उमंग से उछल पड़े,
मेरे मन के भावों को बीना कहे समझ सके,
ऐसे किसी अजनबी के तलाश में,
भटकता रहा हूँ, इस अजनबी जगह,
कुछ चेहरे आँखों के आगे से गुजर जाते है,
इनमें से, किसी-किसी पर नजरें ठहर भी जाती है,
मगर  अफसोस, सच्चाई आँखों में जलने लगती है,
अपने ही अक्स से बातें करता हूँ रोज,
रोज मरता हूँ, पर जिन्दगी चलते रहती है,
जिन्दगी के अनगिनीत अवाजों के निचे दब कर,
दम तोडती, अपने दिल के चीख को सुनता हूँ,
दर्द से करहते हुए मेरे दिल से,
कुछ अस्पष्ट सी अवाज में,
एक जाना-पहचना सा नाम उकेरते जता है,
मगर मैं बार-बार, उसे झूठ साबित करने की कोशिश करता हूँ,
और उसी नाम के सहारे चली जा रही है जिन्दगी।..................................मनोरंजन
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Thursday, July 24, 2014

ख्वाबों से परेशां हूँ
============

ख्वाबों से परेशान हूँ,
ये ख्वाब,
जो पानी के बुलबुले से उठते है,
और जरा सी हवा के झोकों से टूट जाते है,
बड़े उमंग, उत्साह से आगे बढ़ता हूँ,
पर पता नहीं क्यों,
तारीखें बदल जाती है,
और मैं वहीं का वहीं रह जाता हूँ,
मिनटों में सारी दुनिया के सैर कर लेने वाले,
अपने मन की इस जड़ता पर हैरां हूँ,
ख्वाबों से परेसां हूँ। 
हर कोशिशें "काश" बन कर रह जाती है,
काश ऐसा हुआ होता,
काश ऐसा होता,
ऐसे ही अनगिनित काश लिये जी रहा हूँ मुर्दों की तरह,
काश एक कदम बढ़ा दूँ तो जीवन को आकार मिले,
उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती,
नाकामयाबियों के अंधेरे में इसकदर गुम हो गया हूँ,
ये अंधेरा, जो खुद मैने चुना है,
खुद को छुपाने के लिये,
अब काटने लगा है,
ये एहसास भी अब जाते रहेगा,
क्योंकि, जीस तरह से टूटने लगी है,
दिल के अंदर से हर चीज़,
ये एहसास भी मीट जायेगा,
और बस कैद होकर रह जाऊँगा,
इन्ही ख्वाबों के बुलबुलों में।.........................मनोरंजन
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अर्थहीन रिश्ता 
========
रात के तीसरे पहर में,
उठ कर बैठ जता हूँ,
और समने बैठा लेता हूँ,
तुम्हारा साया,
बातें करते हुए तुमसे,
कहता हूँ,
लो खोल कर रख दिया दिल अपना,
पर सच में ऐसा कभी हो नहीं पाया,
एक अनजाने डर और संकोच से,
इन तन्हाइयों में भी,
सच बोलने का हिम्मत ना कर पाया,
और हर बार ही मेरा मन,
असीम पिडा और यंत्रणा से भर आया,
तुम्हारे ही व्यक्तित्व को अडा-तिरछा कर,
कई तरह के तस्वीरें बनाता हूँ,
फिर उन तस्वीरों को सजा-संवार कर,
उससे प्रेम करना चाहता हूँ,
मगर उंगलियाँ कांपने लगती है,
और तस्वीर बिगड जाती है,
रोज कोशिश करता हूँ,
मगर तस्वीर कभी पुरा नआ कर पाया,
अब ऐसे में मन खिन्न हो जाता है,
क्रोध, दुख और अक्रोश से हर बार गला भर आया,
छाती के पास कुछ जलने सा लगता है,
मगर उस धुएँ को अंदर ही पीने के प्रयास में,
आँखों में पानी भर आता है,
जिसका कोई मोल नहीं,
बिल्कुल अर्थहीन!....................मनोरंजन
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Tuesday, July 22, 2014

दिल-ए-अजीज 
==========
दिल जीवन में एक बार,
अपने सबसे अजीज खिलौने को माँगता है,
गर मिल जाये तो जीवन में बहार आ जाती है,
और गर ना मिला तो,
आप कितने भी बड़े मुकाम को छू लें,
चाहे कितनी ही उँची हस्ती हो जाये आपकी,
चाहे कितनी भी बड़ी सफलता पा लें आप,
आँसू के कुछ बूँदें,
हर वक्त पलकों से लुढ़कने को आतुर रहते है।...........मनोरंजन


एक गीत
=======
मन ना जाने क्यों फिर उदास है,
उनकी आई है यादें, या फिर वो निराश है।
ऐसा तो अक्सर ही होते रहता है,
कभी हंसता है दिल, कभी रोता है,
आज फिर दिल को शायद उनकी तलाश है।
मन ना जाने क्यों फिर उदास है..................मनोरंजन

Monday, July 21, 2014

क्योंकी मोबाइल फोन पर दिखती है मुझे गोल रोटी
==================================
मोबाइल फोन,
मुझे जंचता ही नहीं है,
मेरे व्यक्तित्व के साथ रचता ही नहीं है,
मोबाइल पर,
उनका फोन नहीं आता,
जिनके फोन का इंतजार हर पल रहता है,
मोबाइल पर,
उन स्वच्छन्द, शीतल हवाओं,
के भी फोन नहीं आते,
जो थके हुए कदमों में,
जान डाल देते है,
मोबाइल पर,
अधूरे सपनों के उन साथियों के भी फोन नहीं आते,
जो जनाते है मुझे,
और मेरे मन को,
शायद, दुनिया में सबसे ज्यादा,
ना जाने किस शहर में,
किस जगह गुमनाम हो गए है सब,
मोबाइल पर फोन आते है,
मोटे-मोटे रस्सियों के,
मजबूत धागे से, करीने से गुंथी डोरियों के,
जो मुझे बान्ध कर रख लेना चाहते है,
अपने दहलीज़ पर,
ताकी वो मेरा जैसे चाहे,
वैसे इस्तेमाल कर सके, 
मोबाइल पर फोन आते है उन लोगों के,
जो मुझे इस्तेमाल करना चाहते है,
एक मशीन की तरह,
बिना मेरी भावनात्मक जरूरतों की परवाह किए,
पर मोबाइल फोन रखना अब लजमी सा हो गया है,
क्योंकी मोबाइल पर दिखती है मुझे,
गोल रोटी घुमती हुई,
एक मिनट के लिए भी इसे,
कभी बंद नहीं होने देता,
क्योंकी डर लगा रहता है की,
मोबाइल बंद होने से,
कहीं रोटी ना गायब हो जाये,
क्योंकी मोबाइल पर सुनाई दे देती है कभी-कभी,
मेरी "परी" की अवाज,
जो मुझे अभी पापा कहना सिख राही है,
क्योंकी मोबाइल पर सुनाई दे देती है,
माँ की हुलसती सी अवाज,
जो हर वक्त नेटवर्क ना आने से रहती है परेशान,
और दबाते रहती है बटन मोबाइल का,
क्योंकी अब भी मेरे मन के अंधेरे में,
कौंध जाती है, उम्मीद की किरण
की शायद फोन आ जाये कभी उनका,
जिनके एक हैलो के इंतजार में,
गुजरती जा रही है जिन्दगी।...................................मनोरंजन 
http://manoranjan234.blogspot.in/
क्योंकी मोबाइल फोन पर दिखती है मुझे गोल रोटी
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मोबाइल फोन,
मुझे जंचता ही नहीं है,
मेरे व्यक्तित्व के साथ रचता ही नहीं है,
मोबाइल पर,
उनका फोन नहीं आता,
जिनके फोन का इंतजार हर पल रहता है,
मोबाइल पर,
उन स्वच्छन्द, शीतल हवाओं,
के भी फोन नहीं आते,
जो थके हुए कदमों में,
जान डाल देते है,
मोबाइल पर,
अधूरे सपनों के उन साथियों के भी फोन नहीं आते,
जो जनाते है मुझे,
और मेरे मन को,
शायद, दुनिया में सबसे ज्यादा,
ना जाने किस शहर में,
किस जगह गुमनाम हो गए है सब,
मोबाइल पर फोन आते है,
मोटे-मोटे रस्सियों के,
मजबूत धागे से, करीने से गुंथी डोरियों के,
जो मुझे बान्ध कर रख लेना चाहते है,
अपने दहलीज़ पर,
ताकी वो मेरा जैसे चाहे,
वैसे इस्तेमाल कर सके, 
मोबाइल पर फोन आते है उन लोगों के,
जो मुझे इस्तेमाल करना चाहते है,
एक मशीन की तरह,
बिना मेरी भावनात्मक जरूरतों की परवाह किए,
पर मोबाइल फोन रखना अब लजमी सा हो गया है,
क्योंकी मोबाइल पर दिखती है मुझे,
गोल रोटी घुमती हुई,
एक मिनट के लिए भी इसे,
कभी बंद नहीं होने देता,
क्योंकी डर लगा रहता है की,
मोबाइल बंद होने से,
कहीं रोटी ना गायब हो जाये,
क्योंकी मोबाइल पर सुनाई दे देती है कभी-कभी,
मेरी "परी" की अवाज,
जो मुझे अभी पापा कहना सिख राही है,
क्योंकी मोबाइल पर सुनाई दे देती है,
माँ की हुलसती सी अवाज,
जो हर वक्त नेटवर्क ना आने से रहती है परेशान,
और दबाते रहती है बटन मोबाइल का,
क्योंकी अब भी मेरे मन के अंधेरे में,
कौंध जाती है, उम्मीद की किरण
की शायद फोन आ जाये कभी उनका,
जिनके एक हैलो के इंतजार में,
गुजरती जा रही है जिन्दगी।...................................मनोरंजन 
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सॉरी बाबु
======
सॉरी बाबु,
जिन्दगी सचमुच बहुत असान होती,
गर हम साथ होते।
मुमकिन था सबकुछ,
इसी ज़मी पर, इसी शहर में,
बहारे-जन्नत होती अपने कदमों में,
गर हम साथ होते।
चाँद भी अपना होता, और तारें भी,
आसमान का हर कोना हमारा होता,
यों अंधेरे की चाह ना होती,
रात चंदनी होती अपनी,
हर तरफ रोशनी और रागिनी होती,
गर हम साथ होते,
सॉरी बाबु,
जिन्दगी सचमुच बहुत असान होती,
गर हम साथ होते।
तुम रूठती तो मना लेता,
सोती तो जगा लेता,
रोती तो हंसा लेता,
तुम्हारे जुबां से तो गाली भी सुनने की आदत है मुझे,
कोई और देता है तो बर्दाश्त नहीं होता,
लोगों से नजरें चुरा कर,
खुद हो तन्हाइयों के चादर में,
लपेटने की चाहत ना होती,
यों रंजो-गम और अंसूओं से भीगी जिन्दगी ना होती,
गर हम साथ होते,
सॉरी बाबु,
जिन्दगी सचमुच बहुत असान होती,
गर हम साथ होते।.....................................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/


मनोरंजन

Saturday, July 12, 2014

स्मृति शेष-10
=========
वादा था तुमसे मिलने का,
मगर बिना जूते और अच्छे कपड़े के,
तुम्हारे हास्‍टल जाकर,
तुम्हारी सहेलियों के सामने,
तुम्हे शर्मिंदा नहीं कर कर सकता था,
इसलिये,
पता होते हुए भी,
ढूंढते रहा तुम्हे महीनों,
उस नए जगह पर,
जहाँ हम दोनों कुछ बनाने गये थे,
और बन भी रहे थे,
मेरे अंदर एक पुरुष बन रहा था,
और तुम्हारे अंदर एक स्त्री,
महीनों तक, मैं रोज उस जगह जाता,
जहाँ से निकलने की संभावना थी तुम्हारी,
और एक दिन पूर्ण हुए मेरी मनोकामना,
जब डोर से, हमेशा की तरह खिलखिलाते हुए,
तुम चली आ रही थी, अपने दो सहेलियों के साथ,
मुझ पर नज़र पड़ी तुम्हारी,
और तुमने कुछ कहा था अपने सहेलियों के कानों में,
दोनों चुप-छाप चली गयी थी,
कैसा लगा था तुम्हे?
मुझे वहाँ देख कर, शायद पूछा था मैने,
और शायद, तुमने कुछ कहा भी होगा,
पर जिस तरह, हम दोनों बिना एक-दूसरे को सुने,
लगातार बोले जा रहे थे,
उसमें, तुमने क्या कहा, मैने क्या कहा,
कुछ याद ना रहा,
और हम सीधे जाकर गंगा तट पर रुके,
दूर तक फैला गंगा का पानी,
और सूर्य का, बिल्कुल लाल गोला,
गंगा नदी को दूसरे चोर पर छू रहा था,
और इस चोर पर हमदोनों, छो रहे थे गंगा को,
बहुत ही मनोरम लगा था उस दिन गंगा तट,
फिर कभी, कहीं भी,
नहीं दिखी गंगा अपने इतने खूबसूरती के साथ,
हम बातें कर रहे थे,
अपने पाँव को पानी में डुबाए,
शायद मैं "साइंस" की बात कर रहा था,
और तुम "कमर्स" की,
दोनों का कोई मेल नहीं था,
आज जीवन के इस मोड पर आकर देखो,
ना मेरा "साइंस" बचा है,
ना तुम्हारा "क्मर्स" बचा है,
बचा है तो बस जीवन की उबड़-खाबड़ राहें,
मेरे आगे भी,
और तुम्हारे आगे भी।.......................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/


डर
==
मैं बैठ कर पढ़ रहा था,रात बहुत गहरी हो चुकी थी, चारों तरफ सिर्फ अंधेरा -ही अंधेरा पसरा था।
तभी किसी ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी। मैने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा की एक बहुत ही भयानक पिचास( बुरी आत्मा) खड़ा है।
मैने अपनी पूरी ताकत लगा कर दरवाज़े को बंद करने की कोशिश की, मगर उस पिचास की ताकत मुझसे हजार गुना ज्यादा थी।
उसने अपने हाथों को लम्बा किया और मेरा गला पकड़ कर दबाने लगा। मैं जोर-जोर से चीख रहा था, मगर मेरे गले से सिर्फ सांय-सांय की अवाज ही आ पा रही थी।कभी देर तक ज़दोजहद करने के बाद, मैं हर गया, मेरा शरीर बिल्कुल ऐसा हो गया,जैसे किसी ने प्राण निचोड़ लिया हो। तभी मेरे बगल में सो रहा मेरा मित्र, मुझे जगाया। मैं बहुत भयानक दुस्वप्न देख रहा था।
       फिर मैं सो गया और देखता हूँ की एक पागल हाथी, मेरे पीछे दौड़ा आ रहा है। मैने अपनी पूरी जोर लगा कर भागने का प्रयास किया पर मेरे दोनो पैर आपस में टकरा गये और मैं गीर गया। हाथी, मेरे बिल्कुल करीब आ चुका था, फिर उठ कर मैने दौड़ना चाहा, मगर मेरे पैर सुन्न हो चुके थे। और चीखने लगा, मगर फिर वही गले से सांय-सांय की आवाज ही निकल पा रही थी।
 फिर मेरे मित्र ने मुझे झंझोड़ा और बोला" छाती पर से हाथ हटाओ"
उस दिन समझ में आया की, अगर छाती पर हाथ रखने से नींद में इतने भयानक दुस्वप्न आते है तो,
असल जीवन में जो लोग हर वक्त डर, भय, आशंका को अपने दिल मे जगह देकर हर वक्त "छाती पर हाथ" रखे रहते है, उनकी तो जिंदगी नारकीय ही हो जाती होगी ना। ये सच है की जिस आदमी के दिल में डर, भय और आशंका घर कर जाता है, उसकी दशा मेरे दुस्वप्नों की तरह ही हो जाती है। वो आदमी चीखता है, पर उसकी आवाज नहीं निकलती। भागना चाहता है, मगर पैर सुन्न हो चुके होते है और पूरा शरीर ही प्राण रहित हो जाता है। इसलिये अगर जीवन को उन्मुक्त अंदाज में जीना है तो कभी भी डर को अपने दिल में जगह नहीं देनी चाहिये।......मनोरंजन
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Friday, July 11, 2014

कर्ण
===
असान नहीं होता,
किसी भी काल-समय में,
कर्ण बन पाना,
ना तब असान था,ना अब है,
क्योंकि,
कर्ण होने का मतलब है,
जान-बुझ कर विष पीना,
धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय का
समुचित ज्ञान होते हुए भी,
धर्म प्रिय, न्याय प्रिय, दानशील और दयालु होते हुए भी,
अधर्म और अन्याय का साथ देना,
असान नहीं होता,
किसी भी काल- साम्य में,
कर्ण बन पाना।
क्योंकि कर्ण ने अपने जीवन में,
सिर्फ एक ही रिश्ते को महसूस किया,
सिर्फ एक ही रिश्ते से स्नेह पाया,
और वो थी दुर्योधन की मित्रतता,
दुर्योधन की मित्रतता?
दुर्योधन जैसे स्वार्थी,अभिमानी,अधर्मी,
और हर किसी को अपमान करने वाला शख्स,
किसी का श्रेष्ट मित्र कैसे हो सकता था?
कर्ण जनता था की दुर्योधन की मित्रतता श्रेष्ट नहीं,
पर मित्र कभी श्रेष्ट या भ्रष्ट नहीं होते,
मित्र तो सिर्फ मित्र होते है,
और उसी मित्र की जीत के लिये,
लड़ता रहा कर्ण,
ये जानते हुए भी की,
अधर्म की कभी जीत हो नहीं सकती,
असान नहीं होता कर्ण बन पाना,
किसी भी काल-समय में,
इतना बड़ा, बहादुर योद्धा,
क्यों किसी के कटाक्ष की परवाह करे?
इतना श्रेष्ट धनुर्धर,
क्यों किसी की निंदा और अपमान सुने?
पर कर्ण होने का तो मतलब ही है,
सर्वश्रेष्ट गुणों से सज्जित होकर भी,
अपमान, निंदा और कटाक्ष सहे,
इसिलिये कहते है,
आसन नहीं होता किसी भी काल-समय में,
कर्ण बन पाना।............................................मनोरंजन

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स्मृति शेष-9
=========
तारीफ करनी होगी,
तुम्हारे जज्बे की,
जीवन से सीखने के प्रति,
तुम्हारी गंभीरता की,
जीतनी सिद्धत से प्रेम निभाया तुमने,
उससे कई गुना सिद्धत से,
नफरत निभा दी,
मैं ही मूर्ख,
कुछ सीख ना पाया जीवन से,
ना प्रेम निभा सका ठीक से,
ना नफरत निभा पाया तुमसे।.................मनोरंजन 
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पीड़ा 
===
जनता हूँ,
परवाह नहीं तुम्हे,
ना टूटने का,
ना बिखरने का,
ना बिछड़ने का,
आदत हो गयी है तुम्हे,
इस तपिश को सहने की,
कोमल एहसासों के फूल,
कब के मुरझा चुके है,
हर मधुर स्मृति,
तुम्हे आंगारों पर सुला देते है,
और अब जलाने को कुछ बचा ही नहीं,
सिवाय राख के,
पर मैं तो अभी भी जल रहा हूँ,
बल्कि शुरू हुआ है, मेरा जलना,
इसलिये,
महसुस कर सकता हूँ,
क्या होता है जलना,
खुद के दर्द से तो तडपता ही हूँ,
पर ये सोच कर,
मेरा तडपना बढ़ जाता है कई गुना,
की जब तुम जल रही थी,
तब कितनी पीड़ा सही होगी।..................मनोरंजन
सही नजरिया
=========
जिंदगी कभी ना कभी,
भावनाओं के रंग-बिरंगे बादलों की सैर कर,
ठोस जरूरतों की धूसर जमीं पर आ ही जाती है,
शुरू में, थोड़ा अटपटा सा लगता है,
धूल के कण, आँखों में चुभते है,
पर धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाता है आदमी,
जी तो सब ही रहे है,
कोई थोड़ा कम, कोई थोड़ा ज्यादा,
ये घबराहट, ये बेचैनी,
ये डर और संसय,
इस बात के मात्र सूचक है की,
तुम्हारे पंख, अभी अभ्यस्त नहीं हुए,
हवाओं से टकराने के,
इच्छाएें, अभिलाषा,जुस्तजू,
जीवन में हर निराशा और हताशा के मूल कारण है,
पर कोई तुम्हे " इच्छा' ना करने की कला नहीं सीखा सकता,
दृढ़ता, जज्बा और सही नजरिया, 
भी सिखाई नहीं जा सकती,
ये तो संस्कारों में, और जीवन के अनुभवों से,
खुद ब खुद, व्यक्तित्व में अपनी जगह बनाते जाते है।.............मनोरंजन
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Tuesday, July 8, 2014

एक ऑटो रिक्शा चालक
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एक ऑटो रिक्शा चालक,
साँवले से चेहरे पर, भरपूर ताजगी और रौनक लिये,
चलता है अपना ऑटो, गुड़गाँव शहर के सड़कों पे,
और ज्यादा की कभी खत्म ना होने वाली भूख से,
बिल्कुल अनजान, नहीं मांगता किराया,
अपने ऑटो में बैठने वाले यात्रियों से,
बस कहता है,
बैठ जाइये, जो उचित होगा दे दीजियेगा,
सुन कर मेरी आँखें,
कुछ देर के लिये खुली की खुली रह गई,
और एक सुखद आश्चर्य से,
सूखे हुए होठों पर मुस्कुराहट आ गई,
पर ये सोच कर,दिल बैठने लगा,
की मारा जायेगा यह गरीब,
जालिमों के इस शहर में,
जहाँ एक करोड़पति सेठ,
अपने नौकर के ज्यादा रोटी खाने का उलाहना देने के लिये,
निकाल लेता है वक्त अपने अतिव्यस्त जीवन से,
और उसी उम्र के अपने बेटे के लिये,
हजार रुपया का तेल जला कर जाता है,
शहर के सबसे बड़े मॉल में, जूते दिलवाने,
कंक्रीटों के इस शहर में,
पसर गया है कंक्रीट लोगों के दिलों तक में इसकदर की,
पूरे दिन कड़ी धूप में जी-तोड़ मेहनत करने वाली,
एक मजदूरन को कुछ देर सुस्ताने के एवज में,
गंवाने पड़ जाते है अपने दिहाड़ी में से पचास रुपये,
मारा जायेगा, वो मासूम ऑटो चालक इस शहर में,
जहाँ जमीनों की कीमत लाख रुपये गज,
और इंसानियत और ज़मीर बिक जाते है चंद सिक्कों में,
फिर दिल से दुआ निकली की,
हे ईश्वर इस ऑटो चालक के ऑटो में उसी सवारी को भेजना,
जिसमें बची रह गई हो दो-चार बूंद इंसानियत,
ताकि बचे रहे इसके चेहरे की रौनक,
और ताजी हवा सी उसके बोल,
इस दमघोटू शहर में।............................................मनोरंजन
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एक लघु-कथा
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सुना है आज-कल दिनू काका और काकी में अनबन चल रही है, दोनों एक-दूसरे से सीधी मुंह बत भी नहीं करते,
अभी कुछ साल पहले तक दोनों के प्रागढ़ प्रेम के किस्से बनते थे, गांव, मुहल्ले में।दिनू काका जब काकी को बजार से घुमा कर लते तब सड़क पर ही अपने प्यार के कुछ छोटे-मोटे नमूने दिखा देते थे। इस बारे में कुछ पुछने पर ठठाकर हँसते और कहते यही तो जीवन का सबसे बड़ा सुख है बेटा। पर सुना है अब काकी, दिनू काका को पास भी नहीं फटकने देती। बच्चों की शादी हो गई अब अपने बहू और पोते-पोतियों में उलझी रहती है, और कभी फुरसत भी मिले तो पूजा की थल उठा कर भजन-कीर्तन करने चली जाती है। दिनू काका बेचारे कभी इस पेड के छाव में कभी उस पेड़ के छाव में बैठ कर अपना दिन गुजर रहे है।एक दिन पूछ लिया काका कैसी कट रही है आज-कल? बड़े दुखी स्वर में बोले, बचवा दिन गीन रहे है बुधपे का। मेन कहा अरे काका ऐसी भी उम्र ना हुए आपकी की आप दिन गीनने लग जावे, तो बोले बेटा, जिसकी घरवाली अपने पति का ध्यान नहीं रखती, उसे दिन ही गीनने होते है है। सुन कर तो पहले बहुत हंसी आई, फिर सोचा की काकी की तो ये बहुत बड़ी नाइन्साफी है काका के साथ। आखिर आदमी शादी करता है,इसी ढलती उम्र की जरूरतों के लिये ही ना, वर्ना जवानी में, शादी से मिलाने वाली वो कौन सा सुख है,जो बीना शादी किए हसिल नहीं हो जाती।.............मनोरंजन 
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