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Tuesday, July 1, 2014

परवरिस-एक आलेख
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मनुष्य परिस्थितियों का दास है.....
ये सच है की, वक्त बहुत ताकतवर होता है,
बड़े-से-बड़े पहाड़ भी धरसाही होकर जमींदोज हो जाते है,
वक्त के थपेड़ों से,
पर उतना ही सच ये भी है की,
पत्थर को चीर कर भी दूब निकल आता है।
बच्चा कोई भी हो, किसी का भी हो,
बच्चे कच्चे घड़े की तरह ही होते है,
बल्कि मिट्टी के लोंदे से ही होते है,
ये कुम्हार की कविलीयत पर निर्भर करता है की,
वो इस मिट्टी के लोंदे से कैसा घड़ा बनाता है,
किसी भी इंसान के जीवन में,
माँ-पिता और गुरुजन, इसी कुम्हार के किरदार में ही होते है,
बुराइयों के बीज बहुत पहले,
बचपन में ही पड़ जाते है,
फिर परिस्थितियों के अनुसार ये अपने लिये खाद-पानी भी ले लेते है,
कमजोर शरीर हो तो, बड़ा होकर सब ठीक हो भी जाता है,
पर अगर मन कमजोर रह गया तो,
इसकी व्यथा जीवन भर पिछा करती है,
अभावों में, अपराध पलते है, ये कहना शायद अतिश्योक्ति हो,
पर अच्छे संस्कारों, उच्च नैतिक मूल्यों व मानसिक सबलता के अभाव में,
अपराध पनपते है, ये सर्वथा सत्य है,
सभी माँ-पिता, अपने बच्चों से प्यार करते है शायद,
पर बहुत कम माँ-पिता अपने बच्चों की सही तरह से परवरिस कर पाते है,
निर्धनता और अभावों का घिसा-पिटा बहना बना देना ही उनका एक हथियार होता है,
जबकी बच्चों के सही परवरिस में, दौलत ज्यादा मायने नहीं रखता,
बच्चों के परवरिस में, माँ-पिता की समग्र निष्ठा,त्याग,सुझ-बूझ और उच्च नैतिक मूल्यों की जरूरत होती  है,
जिसे माँ-पिता अपने बच्चों में, रोपित कर सकें,
अच्छी समझ के अभाव में, आप माँ-पिता कैसे बन सकते है?
और अगर बन भी जाते है, तो सम्मान और प्रतिष्ठा के कबिल तो बिल्कुल ही नहीं बन सकते,
बच्चों की परवरिस में, निर्धनता और अशिक्षा किसी भी तरह से बधा नहीं बन सकते,
बल्की माँ-पिता का खुद का चरित्र, खुद का व्यक्तित्व ज्यादा मायने रखता है,
बच्चे पैदा करना और उनका पालन-पोषण कर भर देना, माँ-पिता की जिम्मेवारी नहीं है,
बल्की,अपने बच्चों के सपनें गढने,और उसे सहजता से अकार देना भी माँ-पिता का ही कर्तव्य है,
जब बच्चा पैदा होता है तो साथ में माँ-पिता का भी एक जन्म होता है,
कोई कैसे अपनी पुरानी अदतों से, दुर्वलताओं से खुद को बन्धे रख सकता है, जबकी इश्वर ने उसे एक नई जिम्मेवारी सौपी हो,
ऐसे अनगिनीत माँ-पिता है, जो अनजाने-अनचाहे, अपनी दुर्वलताओं को, अपनी उदिग्नता, हिनभावना, कुंठा,क्रोध,
और खुद के अधुरे कामनाओं का बोझ अपने बच्चों पर डाल कर, नव-अंकुरित पौधों को बुरी तरह से मसल डालते है,
बच्चे नव-अंकुरित पौधों की तरह होते है,
इसमें, खेत की उर्वरकता और बीज की गुणवकता की प्रसंसा जरूर की जा सकती है,
पर सिर्फ अंकुरित भर हो जाने से कोई पौधा अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त नहीं हो जाता,
इसके बाद नव-अंकुरित पौधों का सही तरह से देख-भाल करने की जरूरत होती  है,
पौधों के समुचित विकाश के लिए, धूप,पानी,उर्वरक और जरूरत पड़े तो किटनाशकों की भी जरूरत होती है,
जो उन्हे परजीवी पौधों से बचा सके,
संतान-मोह एक तरह से रुगणता है, यह बच्चों के उपर बहुत बुरा असर डालता है,
ठिक उसी तरह जैसे, हरे-भरे पौधों में अवश्यकता से अधिक जल-जमाव पौधों को पीला कर देता है, और रोग-ग्रस्त भी बना देता है,
मोह-ग्रसता श्रेष्ठ नहीं, इसलिये इससे खुद को बचा कर, बच्चों को प्यार, आत्मियता, समुचित कठोरता, निर्णय क्षमता का विकाश
और समग्र श्रेष्ठ गुणों को बच्चों मे प्रत्यारोपित करना ही सही मायने में अच्छी परवरिस कही जाती है।...........मनोरंजन
 http://manoranjan234.blogspot.in/





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