कर्ण
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असान नहीं होता,
किसी भी काल-समय में,
कर्ण बन पाना,
ना तब असान था,ना अब है,
क्योंकि,
कर्ण होने का मतलब है,
जान-बुझ कर विष पीना,
धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय का
समुचित ज्ञान होते हुए भी,
धर्म प्रिय, न्याय प्रिय, दानशील और दयालु होते हुए भी,
अधर्म और अन्याय का साथ देना,
असान नहीं होता,
किसी भी काल- साम्य में,
कर्ण बन पाना।
क्योंकि कर्ण ने अपने जीवन में,
सिर्फ एक ही रिश्ते को महसूस किया,
सिर्फ एक ही रिश्ते से स्नेह पाया,
और वो थी दुर्योधन की मित्रतता,
दुर्योधन की मित्रतता?
दुर्योधन जैसे स्वार्थी,अभिमानी,अधर्मी,
और हर किसी को अपमान करने वाला शख्स,
किसी का श्रेष्ट मित्र कैसे हो सकता था?
कर्ण जनता था की दुर्योधन की मित्रतता श्रेष्ट नहीं,
पर मित्र कभी श्रेष्ट या भ्रष्ट नहीं होते,
मित्र तो सिर्फ मित्र होते है,
और उसी मित्र की जीत के लिये,
लड़ता रहा कर्ण,
ये जानते हुए भी की,
अधर्म की कभी जीत हो नहीं सकती,
असान नहीं होता कर्ण बन पाना,
किसी भी काल-समय में,
इतना बड़ा, बहादुर योद्धा,
क्यों किसी के कटाक्ष की परवाह करे?
इतना श्रेष्ट धनुर्धर,
क्यों किसी की निंदा और अपमान सुने?
पर कर्ण होने का तो मतलब ही है,
सर्वश्रेष्ट गुणों से सज्जित होकर भी,
अपमान, निंदा और कटाक्ष सहे,
इसिलिये कहते है,
आसन नहीं होता किसी भी काल-समय में,
कर्ण बन पाना।............................................मनोरंजन
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