एक लघु-कथा
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सुना है आज-कल दिनू काका और काकी में अनबन चल रही है, दोनों एक-दूसरे से सीधी मुंह बत भी नहीं करते,
अभी कुछ साल पहले तक दोनों के प्रागढ़ प्रेम के किस्से बनते थे, गांव, मुहल्ले में।दिनू काका जब काकी को बजार से घुमा कर लते तब सड़क पर ही अपने प्यार के कुछ छोटे-मोटे नमूने दिखा देते थे। इस बारे में कुछ पुछने पर ठठाकर हँसते और कहते यही तो जीवन का सबसे बड़ा सुख है बेटा। पर सुना है अब काकी, दिनू काका को पास भी नहीं फटकने देती। बच्चों की शादी हो गई अब अपने बहू और पोते-पोतियों में उलझी रहती है, और कभी फुरसत भी मिले तो पूजा की थल उठा कर भजन-कीर्तन करने चली जाती है। दिनू काका बेचारे कभी इस पेड के छाव में कभी उस पेड़ के छाव में बैठ कर अपना दिन गुजर रहे है।एक दिन पूछ लिया काका कैसी कट रही है आज-कल? बड़े दुखी स्वर में बोले, बचवा दिन गीन रहे है बुधपे का। मेन कहा अरे काका ऐसी भी उम्र ना हुए आपकी की आप दिन गीनने लग जावे, तो बोले बेटा, जिसकी घरवाली अपने पति का ध्यान नहीं रखती, उसे दिन ही गीनने होते है है। सुन कर तो पहले बहुत हंसी आई, फिर सोचा की काकी की तो ये बहुत बड़ी नाइन्साफी है काका के साथ। आखिर आदमी शादी करता है,इसी ढलती उम्र की जरूरतों के लिये ही ना, वर्ना जवानी में, शादी से मिलाने वाली वो कौन सा सुख है,जो बीना शादी किए हसिल नहीं हो जाती।.............मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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