यथार्थ
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मन विचलित है,
वर्तमान का यथार्थ देख कर,
अन्याय और अत्याचार का,
इतना मज़बूत परामार्थ देख कर,
शिकार हो रहे है,
हम जैसे ना जाने कितने,
कुचली जा रही इंसानियत जिसके नीचे,
उस अमानुष का स्वार्थ देख कर,
और बदलाव को उठते कदम असमर्थ देख कर।............मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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