एक विधवा औरत
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मेरे सृजन का सफर अधूरा है,
जब तक मैं आपके जैसे लोगों पर,
अपने कुछ अक्षर खर्च ना कर दूँ,
जिन्होने इसी समाज में रहते हुए,
इसी काल-चक्र में, निष्प्राण पड़े,
जीवन को जीवंत कर दिया था,
इतनी गोरी, इतनी खूबसूरत औरत,
सिर्फ पच्चीस साल के उम्र में विधवा हो जाये,
तो ये किसी की साजिश, कोई षणयंत्र सा लगता है,
साजिश इंसानों का था या भगवानों का था,
कहना मुश्किल है,
पर सच तो ये है की,एक पच्चीस साल की खूबसूरत औरत,
ना सिर्फ विधवा हो गयी बल्कि,
एक बच्ची को गोद में लेकर बेसहारा भी हो गयी,
कैसे बचाया होगा आपने खुद को,
उस समाज से, जो तब और भी ज्यादा संकीर्ण था,
तब भी समाज में, कुछ ऐसे लोग थे जो,
विधवा और बेसहारा औरत को,
अपनी रखैल बना लिया करते थे,
आवैध सम्बंधों का बोलबला तब भी था,
फर्क सिर्फ इतना था की,
इसे कानूनन अपराध नहीं माना जाता था,
या ऐसी चीज़ें प्रकाश में आती ही ना थी,
सब कुछ आपसी समझौतों से हो जाता था,
पर आप तो बला की खूबसूरत थी,
सिर्फ भावनात्मक रिश्ते के दम पर,
कैसे अपना लिया था उस व्यक्ति ने,
जो खुद जीवन में अधूरा और अकेला था,
कैसे सब कुछ आपके और आपकी पुत्री के नाम कर दिया,
जबकि उसका आपसे कोई स्वार्थ ना था,
सुन कर अचरज सा होता है,
आज के समाज, और उससे उत्पन्न मेरे मानसिक विकार,
इस बात पर सहज ही यकीन नहीं कर पा रहा,
पर सच तो सबके सामने था,
क्या भावनात्मक रिश्ते,
इतने गहरे हो सकते है?
की शारीरिक तृष्णा गौण हो जाये,
और मनुष्य अपना सब कुछ,
सिर्फ भावना के लिये कुर्बान कर दे,………………………… मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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