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Saturday, July 12, 2014

डर
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मैं बैठ कर पढ़ रहा था,रात बहुत गहरी हो चुकी थी, चारों तरफ सिर्फ अंधेरा -ही अंधेरा पसरा था।
तभी किसी ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी। मैने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा की एक बहुत ही भयानक पिचास( बुरी आत्मा) खड़ा है।
मैने अपनी पूरी ताकत लगा कर दरवाज़े को बंद करने की कोशिश की, मगर उस पिचास की ताकत मुझसे हजार गुना ज्यादा थी।
उसने अपने हाथों को लम्बा किया और मेरा गला पकड़ कर दबाने लगा। मैं जोर-जोर से चीख रहा था, मगर मेरे गले से सिर्फ सांय-सांय की अवाज ही आ पा रही थी।कभी देर तक ज़दोजहद करने के बाद, मैं हर गया, मेरा शरीर बिल्कुल ऐसा हो गया,जैसे किसी ने प्राण निचोड़ लिया हो। तभी मेरे बगल में सो रहा मेरा मित्र, मुझे जगाया। मैं बहुत भयानक दुस्वप्न देख रहा था।
       फिर मैं सो गया और देखता हूँ की एक पागल हाथी, मेरे पीछे दौड़ा आ रहा है। मैने अपनी पूरी जोर लगा कर भागने का प्रयास किया पर मेरे दोनो पैर आपस में टकरा गये और मैं गीर गया। हाथी, मेरे बिल्कुल करीब आ चुका था, फिर उठ कर मैने दौड़ना चाहा, मगर मेरे पैर सुन्न हो चुके थे। और चीखने लगा, मगर फिर वही गले से सांय-सांय की आवाज ही निकल पा रही थी।
 फिर मेरे मित्र ने मुझे झंझोड़ा और बोला" छाती पर से हाथ हटाओ"
उस दिन समझ में आया की, अगर छाती पर हाथ रखने से नींद में इतने भयानक दुस्वप्न आते है तो,
असल जीवन में जो लोग हर वक्त डर, भय, आशंका को अपने दिल मे जगह देकर हर वक्त "छाती पर हाथ" रखे रहते है, उनकी तो जिंदगी नारकीय ही हो जाती होगी ना। ये सच है की जिस आदमी के दिल में डर, भय और आशंका घर कर जाता है, उसकी दशा मेरे दुस्वप्नों की तरह ही हो जाती है। वो आदमी चीखता है, पर उसकी आवाज नहीं निकलती। भागना चाहता है, मगर पैर सुन्न हो चुके होते है और पूरा शरीर ही प्राण रहित हो जाता है। इसलिये अगर जीवन को उन्मुक्त अंदाज में जीना है तो कभी भी डर को अपने दिल में जगह नहीं देनी चाहिये।......मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/ 

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