पीड़ा
===
जनता हूँ,
परवाह नहीं तुम्हे,
ना टूटने का,
ना बिखरने का,
ना बिछड़ने का,
आदत हो गयी है तुम्हे,
इस तपिश को सहने की,
कोमल एहसासों के फूल,
कब के मुरझा चुके है,
हर मधुर स्मृति,
तुम्हे आंगारों पर सुला देते है,
और अब जलाने को कुछ बचा ही नहीं,
सिवाय राख के,
पर मैं तो अभी भी जल रहा हूँ,
बल्कि शुरू हुआ है, मेरा जलना,
इसलिये,
महसुस कर सकता हूँ,
क्या होता है जलना,
खुद के दर्द से तो तडपता ही हूँ,
पर ये सोच कर,
मेरा तडपना बढ़ जाता है कई गुना,
की जब तुम जल रही थी,
तब कितनी पीड़ा सही होगी।..................मनोरंजन
===
जनता हूँ,
परवाह नहीं तुम्हे,
ना टूटने का,
ना बिखरने का,
ना बिछड़ने का,
आदत हो गयी है तुम्हे,
इस तपिश को सहने की,
कोमल एहसासों के फूल,
कब के मुरझा चुके है,
हर मधुर स्मृति,
तुम्हे आंगारों पर सुला देते है,
और अब जलाने को कुछ बचा ही नहीं,
सिवाय राख के,
पर मैं तो अभी भी जल रहा हूँ,
बल्कि शुरू हुआ है, मेरा जलना,
इसलिये,
महसुस कर सकता हूँ,
क्या होता है जलना,
खुद के दर्द से तो तडपता ही हूँ,
पर ये सोच कर,
मेरा तडपना बढ़ जाता है कई गुना,
की जब तुम जल रही थी,
तब कितनी पीड़ा सही होगी।..................मनोरंजन
No comments:
Post a Comment
Write here