Followers

Wednesday, July 2, 2014

स्मृति शेष-7
==========
ऐसा क्यों होता है की,
मेरे जीवन के घोर निराशा,
और नाउम्मीदी के पलों में भी,
रौशन हो जाती नामालूम उम्मीद की किरणें,
जब तुम्हे सोचता हूँ,
बरबस ही मेरे होठों पर खिल जाती है,
एक मुस्कुराहट,
जो ना जाने कब से रूठी होती है,
जब याद आती है मेरे जीवन की,
कुछ ऐसी बातें जो मैं सिर्फ तुम्हे बताना चाहता था,
मेरे कदमों मे अचानक से तेजी आ जाती,
जैसे मेरे उपर से कई मन का बोझ हटा दिया गया हो,
जब पूछ लेती हो कभी भूले से ही हाल-चाल मेरा,
ना जाने कहाँ से आ जाती है मुझमें,
इतनी जोश, इतना उत्साह,
की सब कुछ इतना असान सा लगने लगता है,
की लगने लगता है की कुछ भी मुश्किल नहीं है पाना जीवन में,
अगर पूछ लेती हो एक बार मेरे काम के बारें में,
ऐसा क्यों होता है की,
मेरे ख्यालों में बार-बार ये आता है की,
पा सकते थे सब कुछ,
अगर तुम्हारा साथ मिल जाता,
और ये सोच कर दिल बैठ सा जाता है,
की अब क्या होगा कुछ पाकर,
अगर तुम साथ ही ना हो,
क्या तुम्हे नहीं लगता की गलत कुछ हो गया है?
क्या तुम्हे नहीं लगता की शायद कुछ बाकी है,
हम दोनों के बीच,
जिसे ठीक किया जा सकता है?............................मनोरंजन

No comments:

Post a Comment

Write here