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Tuesday, July 8, 2014

कायर होने की सज़ा
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तुम्हे लगता है की जिंदा हूँ मैं,
पर मैं जानता हूँ की,
सिर्फ जीने का नाटक कर रहा हूँ,
जिसके हर सांस पर दस्तक हो तक़ाज़ों का,
वो जिंदा होकर भी कैसे जीता है,
जानता हूँ मैं,
अपनी कायरता की सज़ा,
मैं अपने ख़्वाबों में भी भुगतते रहा हूँ,
जब आकर तुम्हारे इतने करीब भी,
तुम्हे छुने से वंचित रह जाता हूँ,
जानता हूँ मैं,
मेरी जीवन की सबसे बड़ी प्यास हो तुम,
पर अफसोस,तुम चाह कर भी नहीं बूझा सकती इस प्यास को,
एक वक्त था, जब तुम्हारे स्नेह के दो-चार बूंद से ही,
तर हो सकती थी मेरे जीवन की धरातल,
पर अब इतनी चौड़ी हो चुकी है, दरारें इस जमीं में की,
तुम खुद सूख कर लुप्त हो जाओगी, इन दरारों में,
पर ये जमीं अब बंजर के बंजर ही रहेगी,
मत पुकारो मुझे अब,
की तुम्हारी अवाज दिल में गफलत सी पैदा करती है,
की कहीं मैं जिंदा तो नहीं।.............................................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/



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