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Monday, July 21, 2014

क्योंकी मोबाइल फोन पर दिखती है मुझे गोल रोटी
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मोबाइल फोन,
मुझे जंचता ही नहीं है,
मेरे व्यक्तित्व के साथ रचता ही नहीं है,
मोबाइल पर,
उनका फोन नहीं आता,
जिनके फोन का इंतजार हर पल रहता है,
मोबाइल पर,
उन स्वच्छन्द, शीतल हवाओं,
के भी फोन नहीं आते,
जो थके हुए कदमों में,
जान डाल देते है,
मोबाइल पर,
अधूरे सपनों के उन साथियों के भी फोन नहीं आते,
जो जनाते है मुझे,
और मेरे मन को,
शायद, दुनिया में सबसे ज्यादा,
ना जाने किस शहर में,
किस जगह गुमनाम हो गए है सब,
मोबाइल पर फोन आते है,
मोटे-मोटे रस्सियों के,
मजबूत धागे से, करीने से गुंथी डोरियों के,
जो मुझे बान्ध कर रख लेना चाहते है,
अपने दहलीज़ पर,
ताकी वो मेरा जैसे चाहे,
वैसे इस्तेमाल कर सके, 
मोबाइल पर फोन आते है उन लोगों के,
जो मुझे इस्तेमाल करना चाहते है,
एक मशीन की तरह,
बिना मेरी भावनात्मक जरूरतों की परवाह किए,
पर मोबाइल फोन रखना अब लजमी सा हो गया है,
क्योंकी मोबाइल पर दिखती है मुझे,
गोल रोटी घुमती हुई,
एक मिनट के लिए भी इसे,
कभी बंद नहीं होने देता,
क्योंकी डर लगा रहता है की,
मोबाइल बंद होने से,
कहीं रोटी ना गायब हो जाये,
क्योंकी मोबाइल पर सुनाई दे देती है कभी-कभी,
मेरी "परी" की अवाज,
जो मुझे अभी पापा कहना सिख राही है,
क्योंकी मोबाइल पर सुनाई दे देती है,
माँ की हुलसती सी अवाज,
जो हर वक्त नेटवर्क ना आने से रहती है परेशान,
और दबाते रहती है बटन मोबाइल का,
क्योंकी अब भी मेरे मन के अंधेरे में,
कौंध जाती है, उम्मीद की किरण
की शायद फोन आ जाये कभी उनका,
जिनके एक हैलो के इंतजार में,
गुजरती जा रही है जिन्दगी।...................................मनोरंजन 
http://manoranjan234.blogspot.in/

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