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Friday, July 11, 2014

सही नजरिया
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जिंदगी कभी ना कभी,
भावनाओं के रंग-बिरंगे बादलों की सैर कर,
ठोस जरूरतों की धूसर जमीं पर आ ही जाती है,
शुरू में, थोड़ा अटपटा सा लगता है,
धूल के कण, आँखों में चुभते है,
पर धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाता है आदमी,
जी तो सब ही रहे है,
कोई थोड़ा कम, कोई थोड़ा ज्यादा,
ये घबराहट, ये बेचैनी,
ये डर और संसय,
इस बात के मात्र सूचक है की,
तुम्हारे पंख, अभी अभ्यस्त नहीं हुए,
हवाओं से टकराने के,
इच्छाएें, अभिलाषा,जुस्तजू,
जीवन में हर निराशा और हताशा के मूल कारण है,
पर कोई तुम्हे " इच्छा' ना करने की कला नहीं सीखा सकता,
दृढ़ता, जज्बा और सही नजरिया, 
भी सिखाई नहीं जा सकती,
ये तो संस्कारों में, और जीवन के अनुभवों से,
खुद ब खुद, व्यक्तित्व में अपनी जगह बनाते जाते है।.............मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

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