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Monday, July 28, 2014

निश्छल प्रेम
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किसी के खूबसूरत होने,
ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता,
कोई अपना है, या पराया,
इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता,
उम्र,जाति, दौलत, हैसियत,
जैसे सामाजिक दायरे भी बौने हो जाते है,
दिल की अपनी एक दुनिया है,
जहाँ मिट जाते है सारे फासले,
और रह जाता है,
सिर्फ निश्छलता, अटूट अनुराग,
आशक्ति और समर्पण,
मन बिना किसी शर्त के,निस्वार्थ भाव से,
बन जाता है किसी का दास,
विचारधारा, विद्वता और सोच,
धरे के धरे रह जाते है,
ये जानते हुए भी की मिटते रहे है,
परवाने जल कर,
मिट जाना चाहता है दिल उसकी चाहत में,
जिसे अपने अंदर गहराइयों में बैठा लिया है,
फिर पाने की हसरत नहीं रहती,
बल्कि देने में ही इतना आनंद आता है,
की कुछ पाने की लालसा ही खत्म हो जाती है,
मन बस उड़ते रहना चाहता है,
उन्मुक्त पंक्षी की तरह खुले आसमान में,
मन झूमते रहता है एक खामोश संगीत की धून पर,
डुबा रहता है हर पल अपने प्रियतम की याद में,
हर तरफ जैसे खूबसूरत फूलों के बाग़ उग आये हो,
और दौड़ता है मन उस बाग़ में अपने बाहों को फैलाये,
छुप जाना चाहता है,
अपने प्रियतम के होठों के जुम्बिस में,
और सिर्फ इतनी सी जुस्तज़ू,
की अपना सर रख कर अपने प्रियतम के गोद में,
जी लें सदियों को बस कुछ लम्हों में।........................................मनोरंजन
 http://manoranjan234.blogspot.in/

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