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Thursday, July 24, 2014

ख्वाबों से परेशां हूँ
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ख्वाबों से परेशान हूँ,
ये ख्वाब,
जो पानी के बुलबुले से उठते है,
और जरा सी हवा के झोकों से टूट जाते है,
बड़े उमंग, उत्साह से आगे बढ़ता हूँ,
पर पता नहीं क्यों,
तारीखें बदल जाती है,
और मैं वहीं का वहीं रह जाता हूँ,
मिनटों में सारी दुनिया के सैर कर लेने वाले,
अपने मन की इस जड़ता पर हैरां हूँ,
ख्वाबों से परेसां हूँ। 
हर कोशिशें "काश" बन कर रह जाती है,
काश ऐसा हुआ होता,
काश ऐसा होता,
ऐसे ही अनगिनित काश लिये जी रहा हूँ मुर्दों की तरह,
काश एक कदम बढ़ा दूँ तो जीवन को आकार मिले,
उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती,
नाकामयाबियों के अंधेरे में इसकदर गुम हो गया हूँ,
ये अंधेरा, जो खुद मैने चुना है,
खुद को छुपाने के लिये,
अब काटने लगा है,
ये एहसास भी अब जाते रहेगा,
क्योंकि, जीस तरह से टूटने लगी है,
दिल के अंदर से हर चीज़,
ये एहसास भी मीट जायेगा,
और बस कैद होकर रह जाऊँगा,
इन्ही ख्वाबों के बुलबुलों में।.........................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

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