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Saturday, May 31, 2014

हमारा समाज- एक 'ब्‍लैक होल' 
====================
अच्छा ही हुआ,
जो तुम्हे इस तरह टांग दिया गया,
ये समाज तुम्हे इससे बेहतर कुछ दे भी नहीं सकता,
रोज हजार मौत मरने से तो बेहतर ही है ये,
बस अफसोस इस बात की है की,
खिलाने की ज़ीद पर अड़ि तुम,
खिल ना सकी इस दमघोटों माहौल में,
तुम्हारी सांसों को जब्त कर दिया,
किसी खूनी पंजे ने, किसी दरिंदे ने,
तुम्हारे सपने, तुम्हारी हँसी, तुम्हारे सारे उमंग,
सब अधूरे रह गये,
तुम्हारी चंचलता, तुम्हारी अल्हड़ता,
एक पल में निगल गया कोई,
तुम्हारा ये किस्सा, दफन हो जायेगा,
शीघ्र ही, हमारे समाज के 'ब्‍लैक होल' में
सब भूल कर तुम्हे लग जायेंगे,
नया कुछ सृजन करने में,
पर मैं सोच रहा हूँ,
कहाँ अपनी जीत का जश्न माना रहा होगा,
वो पुरुषार्थी, जिसने इतने पुरुषार्थ भरे कारनामे किये,
क्या देखता होगा कभी अपना चेहरा आईने में,
आईने में उसके चेहरे पर पड़ी,
तुम्हारी सिसकीओं की दाग,
क्या देखेगी नहीं उसे?
क्या कभी नहाता होगा वो?
नहाते वक्त उसके अंगों में लगी कोढ़,
क्या देखेगी नहीं कभी?
नहीं, ऐसे लोगों के पास आना नहीं होते,
और ये नहाते भी नहीं,
बस अपनी बदबू, और कोढ़ समाज में फैलाते है...........मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

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हमारा समाज- एक 'ब्‍लैक होल' 
====================
अच्छा ही हुआ,
जो तुम्हे इस तरह टांग दिया गया,
ये समाज तुम्हे इससे बेहतर कुछ दे भी नहीं सकता,
रोज हजार मौत मरने से तो बेहतर ही है ये,
बस अफसोस इस बात की है की,
खिलाने की ज़ीद पर अड़ि तुम,
खिल ना सकी इस दमघोटों माहौल में,
तुम्हारी सांसों को जब्त कर दिया,
किसी खूनी पंजे ने, किसी दरिंदे ने,
तुम्हारे सपने, तुम्हारी हँसी, तुम्हारे सारे उमंग,
सब अधूरे रह गये,
तुम्हारी चंचलता, तुम्हारी अल्हड़ता,
एक पल में निगल गया कोई,
तुम्हारा ये किस्सा, दफन हो जायेगा,
शीघ्र ही, हमारे समाज के 'ब्‍लैक होल' में
सब भूल कर तुम्हे लग जायेंगे,
नया कुछ सृजन करने में,
पर मैं सोच रहा हूँ,
कहाँ अपनी जीत का जश्न माना रहा होगा,
वो पुरुषार्थी, जिसने इतने पुरुषार्थ भरे कारनामे किये,
क्या देखता होगा कभी अपना चेहरा आईने में,
आईने में उसके चेहरे पर पड़ी,
तुम्हारी सिसकीओं की दाग,
क्या देखेगी नहीं उसे?
क्या कभी नहाता होगा वो?
नहाते वक्त उसके अंगों में लगी कोढ़,
क्या देखेगी नहीं कभी?
नहीं, ऐसे लोगों के पास आना नहीं होते,
और ये नहाते भी नहीं,
बस अपनी बदबू, और कोढ़ समाज में फैलाते है...........मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
परी,
तुम जब अस्सी साल की हो जाओगी ना,
तब भी तुम्हारे झुर्रियों वाले गालों पर,
एक चुंबन लेने की जुस्तज़ू बची रहेगी मेरे मन में,
और बची रहेगी वो सारी अधूरी आकांक्षाएं,
जो मेरे मन में तुमसे जुड़ी है,
तुम्हारी हर वो अमानत,जो मेरे पास है,
रखी मिलेगी तुम्हे, ज्यों के त्यों,
तुम्हारे वापस आनएके इंतजार में,
फूलों की कुछ सुखी पंखुड़ियाँ,
जो तुम्हे दे ना सका,
रखी मिलेगी मेरे सबसे अच्छी किताब के पन्नों में,
कुछ कंपते हुए  अनकहे शब्द,
बचे रहेंगे मेरे लबों पर,
जो तुम्हारी जिंदगी जीने की उत्कट आतुरता,
और तेज रफ़्तार तुम्हारी आकांक्षाओं की उड़ान,
में दब गये थे कभी,
अनवरत होते नाम आँखों को समझा लूंगा,
और बचा के रख लूँगा,
आँसूं के कुछ बूँदे,
तुम्हारे वापस आने की खुशी में बहाने के लिये,
और बचाये रखूंगा उस जज्बे को,
जो एक बार तुम्हारे गोद में सर रख कर,
चीर निंद्रा में सो जाने को,
उद्दत है जाने कब से,...............मनोरंजन


Wednesday, May 28, 2014

सच क्या है?
=======
अब जब की हम साथ नहीं है,
राहें, ज़ुदा हो चुकी हमारी,
अब जब की तुम निकल पड़े हो,
किसी नई मंजिल के तरफ,
मुझे अकेला छोड़, इस उलझन भरी राह में,
तुम्हारा, मुझे बार-बार पुकारना,
बहुत अखरता है,
चीटियों सी चलने लगती है,
सारे बदन पर,
जैसे किसी ने मुझे लेटा दिया है,
सुई की बनी सेज़ पर,
भीष्म पितामह की तरह,
क्यों देखते हो बार-बार पलट कर?
क्या देखना चाहते हो,
मेरी लड़खड़ाती कदमों को?
क्या जनना चाहते हो की,
मैं चल पा रहा हूँ की नहीं तुम्हारे बिन?
क्या सुनना चाहते हो,
मेरे होठों से निकलती कराह को?
क्या सच में तुम्हे,
सुकून मिलेगा मेरी आँखों में बेबसी,
और चेहरे पर सिकन देख कर?
या मुझ पर दया दिखाने की जुस्तज़ू,
तुम्हे मजबूर करती है, ऐसा करने को,
या तुम्हे लगता है,
अभी कुछ खुशबू बाकी है,
उन सूखे हुए फूलों में,
क्या सच में तुम्हे लगता है,
अभी जीवन बाकी है,
उन मुरझाये हुए पौधों में,
क्या तुम्हे लगता है सच में,
तुम सींच पाओगे उन पौधों को,
अपनी ओस की बूँदों की तरह मुस्कुराहट से।
......मनोरंजन



सम्पूर्ण सफलता
=========
ऐसी सफलता जो,
श्रेष्ट हो, सम्पूर्ण हो,
जो हृदय तल को संतुष्ट कर दे,
सोची नहीं जाती,
सुनियोजित तरीके के बुनी नहीं जाती,
और तमाम तरीके इस्तेमाल कर,
सुनिश्चित नहीं की जाती,
आकांक्षाओं, सपनों, और सोच से,
उपर उठ कर,
सद्‌भावों से प्रेरित होकर,
किये गये सद्‌कर्मों से छलक आती है...........मनोरंजन
सफलता या शहादत
===========
अए मेरे दोस्त तुझे,
सफलता चाहिये या शहादत?
जहाँ तक मैं जनता हूँ,
सफलता एक झटके में नहीं मिलती,
छोटी-छोटी, तुच्छ, समझी जाने वाली कोशिशों,
और निरंतर असफल प्रयासों,
का परिणाम होती है सफलता,
और शहादत?
जब एक ही कारतूस बचे हो झोली में,
तब उसे खुद के लिये इस्तेमाल कर लेना,
शहादत कहलाता है,
क्या सच में अब एक ही कारतूस,
बचा है तेरी झोली में।......................................मनोरंजन 



Monday, May 26, 2014

लड़कियाँ
=====
उत्तम स्त्री गुणों से संपन्न,
कुछ जहीन लड़कियाँ,
रास्ते में चलते हुए,
लड़खड़ा जाती है कभी-कभी,
और शालीन सहारे को पाकर,
प्रफुलित भी हो जाती है,
नहीं पढ़ पाती, कई बार सही तरह से,
आँखों में छपी भाषा किसी शख़्स के,
कभी कुछ छोटी, कभी बड़ी गलतियाँ कर जाती है,
ये लड़कियाँ डाल पर लगे,
खुबसूरत फूलों की तरह होती है,
जो हवा के झोकों के साथ,
कभी उपर, कभी नीचे, हिलती, डोलती, इतराती,
इसे अपनी अजादी, समझ,
खुशी से झूम जाती है,
ये लड़कियाँ,
पसंद नहीं इन्हे,
खुद को, तोडा जाना,
मुरझाना, या सूख कर बिखर जाना,
हर बार हाथ बढ़ाने वालों के,
हाथों को छूकर दूर झिटक जाना,
अच्छा लगता है,
खूब ठठाकर हँसती है,
जब ऐसा होता है,
बिल्कुल इस सच से अनभिज्ञ,
की,
जीस छोटे कद डाल पर लगी है ये,
उसकी उंचाई, इतनी नहीं होती,
की ज़ीद पर अड़ा कोई हाथ,
इन्हे तोड़ ना लें,
हवा के झोके भी हरदम साथ कहाँ देते है?......मनोरंजन



सौदागर
====
जब तौलते नहीं थे,
तो मिल जाता था अक्सर इतना की,
पाँव जमीन पर नहीं टिकते थे,
जबसे तौलना शुरू किया,
रिस्तो को, प्यार को, दोस्ती को,
हर बार ठगे जाने लगे,
मुझे कहाँ पड़ना था इन पचड़ों में,
मैने तो हर ख्वाब में खुद को उड़ते देखता था,
अनंत नीले आसमान में,
उन्मुक्त हँसी, हँसते देखा,
चहकते देखा खुद को बाग में,
महकते देखा था, खुशबू की तरह हर गुलशन में,
तुमने मुझे सौदागर बना दिया,
मेरे गुनाहगार हो तुम ................मनोरंजन


संतुलित दबाव
========
जीवन में संतुलित दबाव अपरिहार्य है,
क्योंकि कम दाब वाले क्षेत्र में,
अक्सर आंधी, तूफान आने की संभावना बलवती होती है,
और एक हद से ज्यादा दबाव हो जाये तो,
धरती दरक जाती है,
ज्वालामुखी का प्रादुर्भाव हो जाता है !........................मनोरंजन


Saturday, May 24, 2014

दोस्त
====
जब भी मेरे चुम्बकीय प्रभाव से,
मुक्त होता है,
चढ़ता है दो-चार सीढ़ियाँ सफलता के,
फिर नीचे देख कर आँखों से कुछ कहता है,
जैसे मेरे और अपने बीच के फासले को मापता हो,
जैसे इत्मिनान कर लेना चाहता है की,
अब वो मेरे चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र से,
मुक्त हो चुका है की नहीं ,
मैं सोचता हूँ,
क्या सच में मैं इसके कामयाबी पर,
काली छाया हूँ?
मैं तो हमेशा उसे दिल ही दिल में,
जीवन के हर खुशी पाने की दुआ करता हूँ,
की तभी वो लुढ़क कर नीचे गीर जाता है,
और कहता है,
नहीं चाहिये मुझे कोई खुशी,
कोई कामयाबी जिसमें तुम साथ ना हो .......मनोरंजन

Friday, May 23, 2014

दिल के रिश्ते साँसों की तरह होते है
===================
नहीं परी, दिल के रिश्ते,
कुछ हासील करने को नहीं बनते,
दिल के रिश्ते तो साँसों की तरह होते है,
शरीर के पास विकल्प नहीं होता साँसों का,
राजमन्दी नहीं होती की सांस ले की नहीं,
जो हालत शरीर की साँसों के बिना होती है,
वही हालत दिल की अपने प्रियतम बिना होती है,
तड़पता है कुछ समय तक फिर निर्जीव हो जाता है,
दिल की बिडंबना यह है की,
यह दिखता नहीं, इसलिये इसका जनाज़ा भी उठने की,
परवाह नहीं होती किसी को..............मनोरंजन



भगवानजी भी रिश्वत लेते है
================
भगवानजी भी रिश्वत लेते है,
और खूब ठोक-बजा कर लेते है,
जीतना भरी रिश्वत उतना बड़ा कल्याण,
भगवानजी के पैगम्बर यहाँ धरती पर कहते है,
स्वर्ग यहीं है, नर्क यहीं है,
तो सोचो कैसे  दरिद्र नर-नारायण को देख,
नाक सिकोड़ने वाला,
पत्थर के बने नारायण की पूजा -अर्चना कर,
कैसे धरती पर ही स्वर्ग का सुख भोगता है!
पर भगवानजी तो गीता में कहते है,
की दरिद्र नारायण की सेवा सर्वोपरि है,
तो या तो भगवानजी की गीता कोरी किताब है,
या भगवान जी रिश्वत लेते है,
कैसे उन्ही फटे- पुराने कपड़ों में  खड़ी कन्याओं  को देख,
हिकारत से देखने वाला आदमी,
नवरात्र में में, उन्ही कन्याओं को, कन्यभोज खिलाता है,
और माँ दुर्गा, उसकी दुआ कबूल भी करती है,
हर बधा-विघ्ना से बचा कर,
छप्पर-फाड़ दौलत दे देते है,
कैसे मान लूँ मैं की भगवानजी रिश्वत नहीं लेते,
भगवानजी रिश्वत लेते है!...............................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

कवि
===
कवियों की बीबियां बीमार नहीं होती,
बस तबीयत थोड़ी नासाज़ हो जाती है,
ठीक भी हो जाती है अपने आप ही,
कुछ महीनों में, कुछ सालों में,
बिना किसी दवा-दारू के, बिना किसी हकीम के,

कवियों के बच्चें कभी नराज नहीं होते,
रूठते नहीं, रोते भी नहीं किसी खिलौने को पाने को,
वक्त से पहले ही सयाने हो जाते है!

कवियों के बाप की पगड़ी नहीं उछाली जाती कहीं,
ना ही बैठाये जाते है कहीं सबसे पहले बुजुर्ग होने के नाते,
कवियों के बाप की तो शायद पगड़ी ही नहीं होती!

कवियों की माँ, नहीं रोती,
जब बेटा घर से कभी ना लौटने की सूरत में भी,
परदेश जाता है,
कवियों की माँ, नहीं देती उलाहना की,
इस साल भी उनका सोने का ज्यूट्तिया नहीं बना,
अपने बेटों के लम्बी उम्र का व्रत रखने के लिये,
बस लाल धागे में ,जीतने बेटे, उतने गिरह डाल,
बैठ जाती है तन्मयता से जियुट बंधन गोसाई की पूजा करने!

कवि भी पहनता है, खूब झख सफेद कुर्ता -पैजामा,
बस साल में आने वाले, अनगिनत होलियों के छीटें दिख जाती है .........मनोरंजन


Thursday, May 22, 2014

यादों की सिलवटें
===========
जब भी तुम्हे पढ़ना चाहता हूँ,
तो उलझ जाता हूँ,
शुरुआत कहाँ से करूँ?
सारे पन्ने तो तीतर-बीतर हुए पड़े है,
समेटता हूँ इन पन्नों को,
सुव्यवस्थित करने की कोशिश करता हूँ,
तभी नजर पड़ती है, 
कुछ तुड़े-मुड़े पन्नों के एक पुलिंदे पर,
सिलवटों से जर्जर वह पहला पन्ना,
फरवरी की सर्दियों के सुबह की है,
जब तुम सिखाती थी,
मुझे योगा के कुछ आसन,
मैं जान- बूझ कर गीर जाता था,
ताकि तुम सहारा देकर उठा सको मुझे,
दूसरा पन्ना शायद, निरंजन चाय वाले के बेंच पर लिखा,
जब भाप निकलते चाय पीते वक्त,
 मैने अपने हाथों में ले लिये थे,
तुम्हारे कबूतर जैसे पैरों को,
तीसरा पन्ना उस दिन का था,
जब डांस क्लास के बारे में जानने के लिये,
हम चले गये थे उस तरफ,
जहाँ कोई नहीं रहता अक्सर,
और तुमने अपने छोटे से सॉल में सामिल कर लिया था मुझे,
मुझे चलने में दिक्कत हो रही थी,
इसिलिये चलने लगा था अलग,
और तुमने कहा था "बिल्कुल निश्छल बुद्धू हो तुम"
ऐसे ही कई ऐसे पन्ने लिपटे पड़े है,
उस पुलिंदें में,
फीर मेरे हाथों में आया वे पन्ने जो  नये थे,
मई के दोपहर को बैठे थे एक ही बेंच पर,
दोनों खामोश,
ना तुम कुछ कह रही थी, ना मैं कुछ बोल रहा था,
तुम अपनी आकांक्षाओं, उम्मीदों के अधूरे रह जाने से नाराज,
अपनी गर्म सांसों को काबू कर रही थी,
और मैं अपने असफल प्रयासों के पसीने बहा रहा था,
और अचानक मैं बोला जाता हूँ मैं,
तुम भले ही अपनी आकांक्षाओं का हत्यारा समझों मुझे,
भले ही काली स्याही पोत दो मेरे हर,
असफल प्रयासों के पन्नों पर,
पर क्या सच में यही हमारे रिश्ते की आत्मा थी?
तुम्हारी जरूरतों और मेरे असफल प्रयासों के,
इतर कुछ भी ऐसा ना था जो,
समेटे रखता आज भी इन पन्नों को पहले की तरह,
मैं जनता हूँ ये सच नहीं है,
मगर सच क्या है?
जिससे पड़ गये है इतने सिलवटें यादों पर भी,
की अगर पढ़ना भी चाहूँ,
कुछ खूबसूरत पन्ने तो उलझ जाता हूँ ......मनोरंजन 
http://manoranjan234.blogspot.in/

मरणासन्न रात 
===========
मैं सोचता था शायद,
वक्त हमेशा रहेगा,
सुबह की लालिमा की तरह,
सुन्दर, शीतल और सुवासित,
कभी सोचा नहीं की,
दोपहर भी होगा, और
आग उगलेगा वक्त,
जेठ के दिवाकर की तरह,
झुलस जायेंगे सारे,
नवांकुरित पौधे मन के,
अगर मुझे पता होता की,
वक्त इतना बेरहम है,
तो रोक लेता वक्त के पहिये को,
किसी मजबूत धागे से बांध कर,
तुम शायद ठीक ही कहते हो,
कुछ कमी रह गयी मुझमें,
सही तरह से सिंचित ना कर सका,
नव -अंकुरित पौधों को,
पर अब क्या?
वक्त तो भागते जा रहा है तेजी से,
और मैं आज भी ठहरा हुआ हूँ,
वही, अपने नव-अंकुरित पौधों के साथ,
वक्त नहीं रोकेगा अपने रफ़्तार को,
तब तक, जब तक अस्ताचल ना हो जाये,
मिट्टी में मिल जायेंगे सभी नव -अंकुरित शिशु,
बिना अपने जौवन का जौहर दिखाये,
कैसे वापस ला सकता हूँ,
जीवन दायिनी खूबसूरत सुबह को,
दोपहर के बाद तो,
मरणासन्न रात ही आती है...............मनोरंजन
सज़ा
===
आज कुछ लिखा ही नहीं,
क्योंकि,
कुछ दिखा ही नहीं,
आँखों पर लालच, और
ख़ुशामद की पट्टी जो बंधी थी,
मेरे कलम पर,
मेरी स्वतंत्र सोच पर,
गुलामी की जंजीर जो पड़ी थी,
गिरवी रख रखा है जिसके पास,
अपने आत्मा-सम्मान,
अपने स्वाभिमान को,
उसने कुछ देखने ना दिया,
उसने कुछ लिखने ना दिया,
और उसने तुम्हे आने ही ना दिया,
मेरे जेहन में एक पल के लिये भी,
मेरी कविताएं जहाँ अंकुरित होती है,
वहां जाने ना दिया,
तुम अपने कलेंडर में आज की तारीख को,
लाल लिपिस्टिक से गोल कर देना,
आज मैने तुम्हे याद ना किया,
और सज़ा मुकरर कर देना मेरा,
मुझे सज़ा देने को वापस तो आओगी ना?...........मनोरंजन
हालात
=====
धूप में सुखते आँसू,
और अपनों के स्वर्थंधता से मुरझा रहे फूलों की,
परवाह किसी है?
आप व्यवस्था परिवर्तन की बात करते है,
और व्यवस्था में बने अनगिनित छेदों,
को अपना स्वभाग्य समझ,
पुरा लुफ्त भी उठाते है,
नारी सशक्तिकरन की बात करती,
आपकी बिरादरी क्यूँ?
उसके फटे कपडों से झांकती उसकी आत्मा को,
देख उदेग्नित नहीं, उतेजित होते है,
महत्वकांक्षाओं ने रौंद दिया है,
सारे सुक्ष्म एहसासों के बाग को,
कई सूख कर निर्जीव हो चुके है,
कई अब भी सिसक रहे है,
किसी कोने में,
खुद को जिन्दा साबित करने की,
उत्कट अभिलाषा लिये,
रोको कोई इसे मरने से..........मनोरंजन

Friday, May 16, 2014

स्‍वप्नद्रष्टा

===============
सपने पलते है आँखों में,
कुछ बनने के,
कुछ करने के,
फिर आँखों से उतर कार,
बहने लगते है जीवन में,
बाधा-विध्न विकट आते है,
रोकने धारा सपनों के,
पर सफल माँझी  वही है जो,
अपना हाथ नहीं रोकता है,
रख भरोशा निज पतवार पर,
तूफानों से लड़ता है,
विजयश्री होकर जो सदा आगे बढ़्ता है,
सच और स्वाभिमान,
जिसके चेहरे में दिखता है,
वही बदलता है तकदीर,
अपना भी और अपनों के........मनोरंजन

मुझे पहले से पता था,
की जिंदगी एक दिन सिमट जायेगी एक नीड़ में,
व्‍यर्थ और बेमानी हो जायेंगे,
वो सारे शब्द जिन्हे सुन कर,
मेरे कानों में संगीत की धुन,
बजते रहा है अब तक,
बिखर जायेगा वो सारा संगीत,
बच जायेगा बस,
मन के अंदर बजता खालीपन,
कितने ही वो एहसास,
निर्जीव हो जायेंगे,
जो हम अपने मित्रों से,
अलग होते हुए,
बांध कर रख लेते थे,
अपने मन के किसी कोने में,
बदल जायेंगे अर्थ अब,
उन शब्दों के,
जिन्हे सुन कर मन झंकृत हो जाते थे,
अब तो बस बच जायेगी,
जीवन के कश्मकश,
मृग तृष्णा,
मन के खालीपन को,
भौतिक चीज़ों से भरने की,
अब लड़ने को बच जायेगा,
खुद का अपना अंतरद्वंद्व…………………

...............मनोरंजन
अधूरी कोशिशें
===========
मेरी कोशिशें,
अधूरी रह गयी शायद,
ना कर सका इतना पाक,
अपने मन-मंदिर को,
जहाँ बैठा सकूँ तुम्हे,
कर सकूँ तुमसे प्रेम याचना,
अब ढूंढता तुम्हे,
भीड़ में,
बाज़ार में,
पहुँच चुका हूँ मैं भी वहाँ,
जहाँ जाने से मुझे,
हमेशा बहुत एतराज रहा है,
और दुर्भाग्य देखो,
मेरी कोशिशें अब भी अधूरी है!............मनोरंजन
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Thursday, May 15, 2014

तुम मुझे भूल गये ना
============
तुमने वो सवाल पूछा था,
या मेरा हाल पूछा था,
ठिठक गयी थी धरती कुछ देर के लिये,
और जब सम्भाला खुद को,
तो देखा,
मेरे उपर बिल्कुल सफेद कफन सी,
पड़ी बर्फ की परत पिघलने लगी थी,
और पानी के बुलबुलों में,
बजने लगे थे वे शब्द,
जो तुम्हारे होठों से निकले थे,
"तुम मुझे भूल गये ना".....................मनोरंजन
शब्दों को जीने दो,
दिल की तसल्ली के लिये,
इसके बगैर जिन्दगी विरान हो जाएगी,
मन का खालीपन बढते जाएगा,
तुम और तुमसे जुडी हर शय,
खोखले नज़र आओगे,
दर्ज कराते जाओ अपने हर्फ,
वक्त की दिवारों पर,
अच्छा याकी बुरा, परवाह ना कर
ये काम है कसीदकारों का,
वेख़ौफ बढ़ाओ कदम,
रोको मत वक्त की रफ्तार को,
हस्र की परवाह ना कर,
जमाना खुद देखेगा,
ये काम है रसुखदारों का...............मनोरंजन

अस्तित्वा
======
मत छेड़ो उन तारों को,
जो संगीत नहीं शोर पैदा करते है,
आधा-अधूरा टूटा धागा,
बार-बार उलझता है,
मत रोको इसे टूटने से,
ये रफ़्तार जिंदगी का अवरुद्ध कर देते है,
ओश की बूंदों को,
ठहरे रहने दो हरी दूब पर,
ये स्पर्श पाकर,
अपना अस्तित्वा मिटा देते है,
पूर्णिमा की चाँदनी को छुपा कर,
नहीं रखता कोई अपना घर सजने के लिये,
मत बांधो धागे,
तितली के पंखों में,
ये धागे, उसके उडान और खूबसूरती को,
हमेशा के लिये मृत-प्राण कर देते है,
अगर बांधना ही है तो,
बांधो अपने आवेग को,
अपनी तृष्णा को,
जो हर वक्त पहाड़ बन कर,
शून्य में अकेला खड़ा होना चाहता है!
...............मनोरंजन

http://manoranjan234.blogspot.in/

शब्दों को जीने दो
===========

Wednesday, May 14, 2014

जिंदगी जब मायूस होती है, तभी महसूस होती है,
कहीं सुना है, इस वाक्य को,
कविता के लिये,
अनवरत, सदियों की यात्रा करनी पडती है,
जीना पडता है, दर्द को,
पढा है ऐसा मैने
अपने ही एक मित्र, एक गुरु की रचना में,
जो मन को महसूस हो,
उसे सजा कर मात्र लिख देना कविता नहीं है,
कई ख़ूबसूरत गीतों में,
ख़ुद को बजते, सुना है मैने,
अभी कुछ रोज पहले,
एक मज़दूर के चीत्कार का साक्षि बना मैं,
हर रोज घटित होती,
अनेकों वाकायों में, खुद को देखता हूँ,
कई बार उसकी मायूसियों के लिये,
खुद को जिम्मेवार मानता हूँ,
कई बार ऐसा लगता है की,
बचा सकता था मैं उसे,
टूट कर बिखरने से,
संभाल सकता था उसे,                    
फिसल कर गिरते व़क्त,
दूर कर सकता था,
उसके मन के अंधेरे को,
बदल सकता था महफ़िल में,
उसके तन्हाइयों को,
और एक दोस्त का तो ये फर्ज भी था,
पर ऐसा कुछ ना हो सका,
उलट मैं उसके दुश्वारियों की वजह बन गया,
यही मायूसियत है,
जो कविता के हर शब्द में,

बहती है अनवरत................मनोरंजन
वक़्त
===
तुम्हे ग़र है, गुमां  अपने हुस्न पर,
हमें अपने इश्क पर है,
वक़्त ज़ाहिर करेगा,
बेनूर कौन होता है!.....मनोरंजन