सच क्या है?
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अब जब की हम साथ नहीं है,
राहें, ज़ुदा हो चुकी हमारी,
अब जब की तुम निकल पड़े हो,
किसी नई मंजिल के तरफ,
मुझे अकेला छोड़, इस उलझन भरी राह में,
तुम्हारा, मुझे बार-बार पुकारना,
बहुत अखरता है,
चीटियों सी चलने लगती है,
सारे बदन पर,
जैसे किसी ने मुझे लेटा दिया है,
सुई की बनी सेज़ पर,
भीष्म पितामह की तरह,
क्यों देखते हो बार-बार पलट कर?
क्या देखना चाहते हो,
मेरी लड़खड़ाती कदमों को?
क्या जनना चाहते हो की,
मैं चल पा रहा हूँ की नहीं तुम्हारे बिन?
क्या सुनना चाहते हो,
मेरे होठों से निकलती कराह को?
क्या सच में तुम्हे,
सुकून मिलेगा मेरी आँखों में बेबसी,
और चेहरे पर सिकन देख कर?
या मुझ पर दया दिखाने की जुस्तज़ू,
तुम्हे मजबूर करती है, ऐसा करने को,
या तुम्हे लगता है,
अभी कुछ खुशबू बाकी है,
उन सूखे हुए फूलों में,
क्या सच में तुम्हे लगता है,
अभी जीवन बाकी है,
उन मुरझाये हुए पौधों में,
क्या तुम्हे लगता है सच में,
तुम सींच पाओगे उन पौधों को,
अपनी ओस की बूँदों की तरह मुस्कुराहट से।
......मनोरंजन
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