अस्तित्वा
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मत छेड़ो उन तारों को,
जो संगीत नहीं शोर पैदा करते है,
आधा-अधूरा टूटा धागा,
बार-बार उलझता है,
मत रोको इसे टूटने से,
ये रफ़्तार जिंदगी का अवरुद्ध कर देते है,
ओश की बूंदों को,
ठहरे रहने दो हरी दूब पर,
ये स्पर्श पाकर,
अपना अस्तित्वा मिटा देते है,
पूर्णिमा की चाँदनी को छुपा कर,
नहीं रखता कोई अपना घर सजने के लिये,
मत बांधो धागे,
तितली के पंखों में,
ये धागे, उसके उडान और खूबसूरती को,
हमेशा के लिये मृत-प्राण कर देते है,
अगर बांधना ही है तो,
बांधो अपने आवेग को,
अपनी तृष्णा को,
जो हर वक्त पहाड़ बन कर,
शून्य में अकेला खड़ा होना चाहता है!
...............मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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