Followers

Thursday, May 22, 2014

मरणासन्न रात 
===========
मैं सोचता था शायद,
वक्त हमेशा रहेगा,
सुबह की लालिमा की तरह,
सुन्दर, शीतल और सुवासित,
कभी सोचा नहीं की,
दोपहर भी होगा, और
आग उगलेगा वक्त,
जेठ के दिवाकर की तरह,
झुलस जायेंगे सारे,
नवांकुरित पौधे मन के,
अगर मुझे पता होता की,
वक्त इतना बेरहम है,
तो रोक लेता वक्त के पहिये को,
किसी मजबूत धागे से बांध कर,
तुम शायद ठीक ही कहते हो,
कुछ कमी रह गयी मुझमें,
सही तरह से सिंचित ना कर सका,
नव -अंकुरित पौधों को,
पर अब क्या?
वक्त तो भागते जा रहा है तेजी से,
और मैं आज भी ठहरा हुआ हूँ,
वही, अपने नव-अंकुरित पौधों के साथ,
वक्त नहीं रोकेगा अपने रफ़्तार को,
तब तक, जब तक अस्ताचल ना हो जाये,
मिट्टी में मिल जायेंगे सभी नव -अंकुरित शिशु,
बिना अपने जौवन का जौहर दिखाये,
कैसे वापस ला सकता हूँ,
जीवन दायिनी खूबसूरत सुबह को,
दोपहर के बाद तो,
मरणासन्न रात ही आती है...............मनोरंजन

No comments:

Post a Comment

Write here