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Thursday, May 22, 2014

सज़ा
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आज कुछ लिखा ही नहीं,
क्योंकि,
कुछ दिखा ही नहीं,
आँखों पर लालच, और
ख़ुशामद की पट्टी जो बंधी थी,
मेरे कलम पर,
मेरी स्वतंत्र सोच पर,
गुलामी की जंजीर जो पड़ी थी,
गिरवी रख रखा है जिसके पास,
अपने आत्मा-सम्मान,
अपने स्वाभिमान को,
उसने कुछ देखने ना दिया,
उसने कुछ लिखने ना दिया,
और उसने तुम्हे आने ही ना दिया,
मेरे जेहन में एक पल के लिये भी,
मेरी कविताएं जहाँ अंकुरित होती है,
वहां जाने ना दिया,
तुम अपने कलेंडर में आज की तारीख को,
लाल लिपिस्टिक से गोल कर देना,
आज मैने तुम्हे याद ना किया,
और सज़ा मुकरर कर देना मेरा,
मुझे सज़ा देने को वापस तो आओगी ना?...........मनोरंजन

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