यादों की सिलवटें
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जब भी तुम्हे पढ़ना चाहता हूँ,
तो उलझ जाता हूँ,
शुरुआत कहाँ से करूँ?
सारे पन्ने तो तीतर-बीतर हुए पड़े है,
समेटता हूँ इन पन्नों को,
सुव्यवस्थित करने की कोशिश करता हूँ,
तभी नजर पड़ती है,
कुछ तुड़े-मुड़े पन्नों के एक पुलिंदे पर,
सिलवटों से जर्जर वह पहला पन्ना,
फरवरी की सर्दियों के सुबह की है,
जब तुम सिखाती थी,
मुझे योगा के कुछ आसन,
मैं जान- बूझ कर गीर जाता था,
ताकि तुम सहारा देकर उठा सको मुझे,
दूसरा पन्ना शायद, निरंजन चाय वाले के बेंच पर लिखा,
जब भाप निकलते चाय पीते वक्त,
मैने अपने हाथों में ले लिये थे,
तुम्हारे कबूतर जैसे पैरों को,
तीसरा पन्ना उस दिन का था,
जब डांस क्लास के बारे में जानने के लिये,
हम चले गये थे उस तरफ,
जहाँ कोई नहीं रहता अक्सर,
और तुमने अपने छोटे से सॉल में सामिल कर लिया था मुझे,
मुझे चलने में दिक्कत हो रही थी,
इसिलिये चलने लगा था अलग,
और तुमने कहा था "बिल्कुल निश्छल बुद्धू हो तुम"
ऐसे ही कई ऐसे पन्ने लिपटे पड़े है,
उस पुलिंदें में,
फीर मेरे हाथों में आया वे पन्ने जो नये थे,
मई के दोपहर को बैठे थे एक ही बेंच पर,
दोनों खामोश,
ना तुम कुछ कह रही थी, ना मैं कुछ बोल रहा था,
तुम अपनी आकांक्षाओं, उम्मीदों के अधूरे रह जाने से नाराज,
अपनी गर्म सांसों को काबू कर रही थी,
और मैं अपने असफल प्रयासों के पसीने बहा रहा था,
और अचानक मैं बोला जाता हूँ मैं,
तुम भले ही अपनी आकांक्षाओं का हत्यारा समझों मुझे,
भले ही काली स्याही पोत दो मेरे हर,
असफल प्रयासों के पन्नों पर,
पर क्या सच में यही हमारे रिश्ते की आत्मा थी?
तुम्हारी जरूरतों और मेरे असफल प्रयासों के,
इतर कुछ भी ऐसा ना था जो,
समेटे रखता आज भी इन पन्नों को पहले की तरह,
मैं जनता हूँ ये सच नहीं है,
मगर सच क्या है?
जिससे पड़ गये है इतने सिलवटें यादों पर भी,
की अगर पढ़ना भी चाहूँ,
कुछ खूबसूरत पन्ने तो उलझ जाता हूँ ......मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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