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Friday, May 9, 2014


कहाँ जाऊ?
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कहाँ जाऊ?
कोई राह नहीं दिखता तुम बिन,
कहीं से भी चलता हूँ तो,
तुम तक ही पहुँच जाता हूँ,
मेरे हर कतरे-कतरे में,
इसतरह बस गए तुम की,
तुम्हारे बगैर,
कुछ बचता ही नहीं मेरे अस्तित्वा में,
किसकी सुनूँ? किससे कहूँ?
एक पगलों की बस्ती है,
सब अपनी-अपनी गा रहे है,
किसी के पास फुरसत नहीं,
ना कुछ सुनने की,
ना कुछ समझने की,
ना कुछ महसूस करने की,
सब भाग रहे है, बेतहासा,
जाने कहाँ जा रहे है,
मुझे नहीं पता,
मैं बस जड चेतन हो, सब देख रहा हूँ,
और देख रहा हूँ,
उस मोड के तरफ,
जहाँ से लौटना था तुमको,
पर तुम नहीं दिखते कहीं भी,
और नहीं दिखती तुम्हारी लौटने की कोई निसां,
ना जाने कहाँ गुम हो गए हो,
मुझे अकेला छोड़, इस चौराहे पर,
जहाँ से ना जाने कितने रास्ते जाते है कहाँ-कहाँ,
पर मेरे कदमों पर,
ना जाने कितने भारी बोझ रखे है,

उठा भी नहीं पाता इन्हे मैं……………………. मनोरंजन

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