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Saturday, May 10, 2014

मैं तो सदा,
लिखता रहा सिर्फ तुम्हारी खातीर,
ताकी तुम पढ़ सको मुझे,
ढुन्ढ सको कोई रौशन जगह,
मेरे मन के अंधेरे कोने में,
दे सको आकार,
मेरे अनगढ कविताओं को,
सिंच सको, अपने नम होठों से,
मेरे निर्जन, बेजान पडे जीवन को,
सिखा सको मुझे जीना,
रंग भरना, जीवन में,
मैं तो सदा लिखते रहा,
ताकी देख सकूँ,
तुम्हारे आँखों में चमकलबों पर हँसी,
सुन सकूँ तुम्हारे लब से,
"पगले हो तुम बिल्कुल"
जान सकूँ तुम्हारी वो चाहत,
की फ्रेम करा कर रख लेना चाहती हो,
मेरे हर शब्द को, मेरी लेखनी को,
मेरे शब्दों ने ही तोड दिये सीसे सब फ्रेम के,
शब्द के इस दोगले चारित्र को,
समझा ही नहीं,
इसलिये आज भी लिखे जा रहा हूँ l
.....................
मनोरंजन


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