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Wednesday, May 14, 2014

जिंदगी जब मायूस होती है, तभी महसूस होती है,
कहीं सुना है, इस वाक्य को,
कविता के लिये,
अनवरत, सदियों की यात्रा करनी पडती है,
जीना पडता है, दर्द को,
पढा है ऐसा मैने
अपने ही एक मित्र, एक गुरु की रचना में,
जो मन को महसूस हो,
उसे सजा कर मात्र लिख देना कविता नहीं है,
कई ख़ूबसूरत गीतों में,
ख़ुद को बजते, सुना है मैने,
अभी कुछ रोज पहले,
एक मज़दूर के चीत्कार का साक्षि बना मैं,
हर रोज घटित होती,
अनेकों वाकायों में, खुद को देखता हूँ,
कई बार उसकी मायूसियों के लिये,
खुद को जिम्मेवार मानता हूँ,
कई बार ऐसा लगता है की,
बचा सकता था मैं उसे,
टूट कर बिखरने से,
संभाल सकता था उसे,                    
फिसल कर गिरते व़क्त,
दूर कर सकता था,
उसके मन के अंधेरे को,
बदल सकता था महफ़िल में,
उसके तन्हाइयों को,
और एक दोस्त का तो ये फर्ज भी था,
पर ऐसा कुछ ना हो सका,
उलट मैं उसके दुश्वारियों की वजह बन गया,
यही मायूसियत है,
जो कविता के हर शब्द में,

बहती है अनवरत................मनोरंजन

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