चुल्हे की आग
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चुल्हे पर रोटी सेंकती मां,
आँच को कभी कम, कभी तेज़ कर देती है,
मां जानती है,
चुल्हे के आग को किस तरह,
सकारात्मक परिणाम के लिये नियंत्रित करना है,
पर बाबा नहीं जानते,
और समझाने पर समझते भी नहीं,
चुल्हे की आग, बाबा के चेहरे पर,
हर वक़्त दहकते रहती है,
और उनके परिधि में आने वाले लोगों की,
कोमल भावनायें, उस आग में झुलसते रहती है!...........मनोरंजन
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चुल्हे पर रोटी सेंकती मां,
आँच को कभी कम, कभी तेज़ कर देती है,
मां जानती है,
चुल्हे के आग को किस तरह,
सकारात्मक परिणाम के लिये नियंत्रित करना है,
पर बाबा नहीं जानते,
और समझाने पर समझते भी नहीं,
चुल्हे की आग, बाबा के चेहरे पर,
हर वक़्त दहकते रहती है,
और उनके परिधि में आने वाले लोगों की,
कोमल भावनायें, उस आग में झुलसते रहती है!...........मनोरंजन
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